सुप्रीम कोर्ट से पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को झटका, डिस्चार्ज याचिका खारिज

आलमगीर आलम को सुप्रीम कोर्ट से झटका! PMLA मामले में राहत नहीं, डिस्चार्ज याचिका खारिज

आलमगीर आलम को PMLA मामले में राहत नहीं, डिस्चार्ज याचिका खारिज; ED के आरोपों पर चलेगा केस

रांची: झारखंड के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में राहत नहीं मिली है। मामले से खुद को मुक्त करने के लिए दायर उनकी डिस्चार्ज याचिका पहले रांची की विशेष PMLA अदालत में खारिज हुई और इसके बाद झारखंड हाईकोर्ट ने भी उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

6 मई 2026 के अपने फैसले में झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी की ओर से पेश सामग्री प्रथमदृष्टया आगे की न्यायिक कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार दिखाती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर साक्ष्यों की अंतिम विश्वसनीयता या दोषसिद्धि का फैसला नहीं किया जा रहा है।

ED ने टेंडर कमीशन को लेकर लगाए गंभीर आरोप

ED की जांच के अनुसार, ग्रामीण विकास विभाग, JSRRDA और संबंधित डिवीजनों में टेंडर आवंटन और काम के बदले कथित कमीशन वसूली की व्यवस्था थी।

झारखंड हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज ED के आरोपों के मुताबिक, कुल 3 प्रतिशत कमीशन की बात सामने आई थी। एजेंसी का आरोप है कि इसमें 1.35 प्रतिशत हिस्सा तत्कालीन मंत्री आलमगीर आलम तक उनके तत्कालीन PS संजीव कुमार लाल के माध्यम से पहुंचता था, जबकि बाकी हिस्सा अधिकारियों और इंजीनियरों के बीच बांटे जाने का आरोप है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये ED की जांच और अभियोजन पक्ष के आरोप हैं, जिन्हें अदालत ने इस स्तर पर अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य के तौर पर घोषित नहीं किया है।

37.55 करोड़ रुपये की नकदी बरामदगी का जिक्र

ED के रिकॉर्ड के अनुसार, जांच के दौरान रांची में विभिन्न ठिकानों पर कुल 18 तलाशी अभियान चलाए गए। एजेंसी के अनुसार इन तलाशी कार्रवाइयों में करीब ₹37.55 करोड़ नकद, डिजिटल डिवाइस और कई दस्तावेज बरामद किए गए थे।

जांच एजेंसी ने इन बरामद दस्तावेजों और बयानों को कथित कमीशन व्यवस्था से जोड़ते हुए अदालत के सामने रखा है।

हाईकोर्ट ने डिस्चार्ज से क्यों किया इनकार?

झारखंड हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि डिस्चार्ज के चरण में अदालत को यह देखना होता है कि आरोपी के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर अदालत को पूरे मामले की तरह विस्तृत ट्रायल करने या हर साक्ष्य की अंतिम विश्वसनीयता तय करने की जरूरत नहीं होती।

अदालत ने माना कि विशेष PMLA अदालत ने उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद डिस्चार्ज याचिका खारिज की थी और आरोप तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी। हाईकोर्ट ने इसमें हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं पाया।

आलमगीर आलम की ओर से क्या था दावा?

आलमगीर आलम की ओर से अदालत में यह दलील दी गई थी कि उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला बनाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है और उन्हें मामले से डिस्चार्ज किया जाना चाहिए।

वहीं ED ने उनकी भूमिका से जुड़े साक्ष्य होने का दावा करते हुए डिस्चार्ज याचिका का विरोध किया था। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद याचिका खारिज कर दी।

अब आगे क्या?

हाईकोर्ट के आदेश के बाद आलमगीर आलम के खिलाफ PMLA मामले की न्यायिक प्रक्रिया आगे जारी रहेगी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियां प्रथमदृष्टया विचार तक सीमित हैं और ट्रायल कोर्ट मामले का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर स्वतंत्र रूप से करेगा।

इसलिए ED की ओर से लगाए गए कमीशन वसूली और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों को अभी अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। मामले का अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

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