शशि थरूर-Rahul Gandhi की नजदीकी ने बढ़ाई सियासी हलचल, संसद में बचाव के बाद 40 मिनट तक चली ‘बंद कमरा’ बैठक

नई दिल्ली: संसद के गलियारों में सोमवार को एक दिलचस्प वाकया देखने को मिला। लोकसभा में जहां एक ओर Rahul Gandhi और सरकार के बीच तीखी बहस हुई, वहीं दूसरी ओर शशि थरूर और राहुल गांधी के बीच बढ़ती नजदीकी ने कांग्रेस के भीतर और बाहर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। थरूर ने न केवल सदन में राहुल का मजबूती से बचाव किया, बल्कि कार्यवाही स्थगित होने के बाद राहुल के साथ 40 मिनट लंबी बैठक भी की।

राहुल गांधी का ‘डिफेंस’ और थरूर के तर्क

विवाद की शुरुआत तब हुई जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ पर आधारित एक लेख का हवाला देते हुए एलएसी (LAC) के मुद्दे पर सरकार को घेरा। अमित शाह और राजनाथ सिंह सहित मंत्रियों ने इसे ‘भ्रामक’ बताया, लेकिन शशि थरूर राहुल के समर्थन में खुलकर सामने आए।

“ओवर रिएक्शन” की जरूरत नहीं”- थरूर

“ओवर रिएक्शन” की जरूरत नहीं: सरकार को इतनी तीखी प्रतिक्रिया देने के बजाय चर्चा होने देनी चाहिए थी। तथ्य सार्वजनिक हैं, राहुल जिस लेख का हवाला दे रहे थे, वह पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध है। थरूर ने नेहरू काल का जिक्र करते हुए कहा कि 1962 के युद्ध के दौरान भी संसद में बहस हुई थी और खुद कांग्रेस के सांसद सरकार की आलोचना कर सकते थे।

बंद कमरे में 40 मिनट की रहस्यमयी बैठक

सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद असली हलचल राहुल गांधी के कार्यालय में दिखी। वहां कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, केसी वेणुगोपाल और प्रियंका गांधी के साथ शशि थरूर भी पहुंचे।

संस्थाओं बनाम सरकार की जंग

विवाद इस बात पर था कि क्या किसी अप्रकाशित किताब का हवाला सदन में दिया जा सकता है। मंत्रियों ने इसे नियमों के विरुद्ध बताया, जबकि थरूर ने तर्क दिया कि अगर तथ्य गलत हैं, तो उन्हें सुधारने का तरीका तथ्यों को सामने लाना है, न कि विपक्ष की आवाज को रोकना। “संसद का मकसद ही चर्चा करना है। सरकार को किताब के अप्रकाशित होने पर आपत्ति जताने के बजाय राहुल गांधी को अपनी बात पूरी करने देनी चाहिए थी।”- शशि थरूर, सांसद, कांग्रेस

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि थरूर जैसे कद्दावर नेता का राहुल गांधी के लिए ‘ढाल’ बनना कांग्रेस की नई रणनीति का हिस्सा हो सकता है। यह न केवल विपक्ष की एकजुटता को दर्शाता है, बल्कि पार्टी के भीतर आंतरिक तालमेल के सुधरने का भी संकेत है।

 

 

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