रिम्स जमीन घोटाला: 1947 की खरीद से शुरू हुई कहानी, फर्जी दस्तावेजों से हड़पने की साजिश

कैसे लूटी गई रिम्स की जमीन? ACB जांच में खुल रहे चौंकाने वाले राज

रिम्स जमीन घोटाला: 1947 से शुरू हुई जमीन की कहानी, फर्जी वंशावली और दस्तावेजों के सहारे करोड़ों की सरकारी जमीन हड़पने की साजिश

रांची: रांची स्थित रिम्स (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) की जमीन को रैयती भूमि बताकर खरीद-बिक्री करने के मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की जांच लगातार बड़े खुलासे कर रही है। जांच में सामने आया है कि सरकारी अधिग्रहण के बावजूद करोड़ों रुपये मूल्य की इस जमीन को फर्जी दस्तावेज, जाली वंशावली और रिकॉर्ड में हेरफेर कर निजी संपत्ति के रूप में बेचने की कोशिश की गई।

इस मामले में अब तक राजकिशोर बड़ाईक और कार्तिक बड़ाईक समेत चार लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। हाल ही में दोनों आरोपियों की जमानत याचिका भी रांची स्थित एसीबी की विशेष अदालत ने खारिज कर दी।

1947 से शुरू होती है जमीन की कहानी

एसीबी जांच के अनुसार, बड़गाईं अंचल के मोरहाबादी मौजा स्थित खाता संख्या 107, प्लॉट संख्या 1693 की कुल 93 डिसमिल जमीन मूल रूप से मोसामात सहोदरी देवी के नाम दर्ज थी। वर्ष 1947 में सहोदरी देवी के भतीजे गजाधर बड़ाईक ने यह जमीन डीड संख्या 4875 के माध्यम से अब्दुल गफ्फूर खान को बेच दी थी।

इसके बाद 6 फरवरी 1962 को अब्दुल गफ्फूर खान ने यह जमीन डीड संख्या 1382 के जरिए बनारसी दास अरोड़ा को हस्तांतरित कर दी। बाद में झारखंड सरकार ने भूमि अधिग्रहण केस संख्या 01/68-69 के तहत इसी जमीन का एक हिस्सा रिम्स के लिए अधिग्रहित किया और बनारसी दास अरोड़ा को विधिवत मुआवजा भी दिया गया।

पावर ऑफ अटॉर्नी में जोड़ी गई अतिरिक्त जमीन

जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने जमीन पर दावा मजबूत करने के लिए फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार की। इसमें मूल प्लॉट के अलावा खाता संख्या 106, प्लॉट संख्या 1106 की 64 डिसमिल अतिरिक्त जमीन भी शामिल कर दी गई।

एसीबी के मुताबिक यह पूरा खेल सरकारी जमीन को निजी भूमि साबित कर कब्जा और बिक्री का रास्ता तैयार करने के लिए किया गया था।

फर्जी वंशावली के सहारे रची गई साजिश

मामले में सोनमैत देवी नामक महिला ने खुद को सहोदरी देवी की वंशज बताते हुए भूमि बहाली का दावा किया था। हालांकि एसएआर कोर्ट में वह न तो अपना पारिवारिक संबंध साबित कर सकीं और न ही अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत कर सकीं। इसके बावजूद बाद के वर्षों में कथित रूप से सरकारी अभिलेखों में हेरफेर कर जमीन पर दावा मजबूत करने की कोशिश की गई।

एसीबी जांच में आरोप है कि कुछ लोगों ने तत्कालीन अधिकारियों की मिलीभगत से रजिस्टर-II में बदलाव कराया, जबकि रिकॉर्ड में जमीन पहले से सरकारी दर्ज थी।

पत्नी के नाम करा दी जमीन की रजिस्ट्री

जांच एजेंसी के अनुसार, फर्जी वंशावली के आधार पर राजकिशोर बड़ाईक, कार्तिक बड़ाईक और उनके अन्य सहयोगियों ने खुद को जमीन का वैध उत्तराधिकारी बताकर 1.06 एकड़ भूमि की जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार करवाई। इसके बाद इसी दस्तावेज के आधार पर जमीन को निजी व्यक्तियों के नाम स्थानांतरित कर दिया गया।

एसीबी अब पूरे नेटवर्क की जांच कर रही है और यह पता लगाने में जुटी है कि इस कथित जमीन घोटाले में किन-किन अधिकारियों, बिचौलियों और अन्य लोगों की भूमिका रही है।

माना जा रहा है कि जांच आगे बढ़ने के साथ इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।

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