विलुप्ति की कगार पर झारखंड की लोकधरोहर ‘छऊ’, राष्ट्रीय सम्मानित कलाकार ने सुनाई संघर्ष की कहानी
हजारीबाग। झारखंड की सांस्कृतिक पहचान मानी जाने वाली छऊ नृत्य कला आज संरक्षण और संसाधनों के अभाव में गंभीर संकट का सामना कर रही है। यह चिंता किसी आम व्यक्ति ने नहीं, बल्कि देश के प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित छऊ कलाकार परिक्षित महतो ने व्यक्त की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस लोककला को संरक्षण नहीं मिला तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी।
बोकारो जिले के चंदनकियारी प्रखंड स्थित खेड़ाबेड़ा गांव के रहने वाले परिक्षित महतो पिछले चार दशकों से छऊ नृत्य के संरक्षण और संवर्धन में जुटे हुए हैं। अपनी कला के दम पर उन्होंने झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। उनकी इसी साधना और योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
सम्मान मिला, लेकिन संघर्ष आज भी जारी
परिक्षित महतो का कहना है कि राष्ट्रीय सम्मान मिलने के बावजूद जमीनी स्तर पर कलाकारों की स्थिति में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। उन्होंने बताया कि उनकी छऊ मंडली आज भी सीमित संसाधनों के बीच काम कर रही है। वाद्ययंत्र, पोशाक और पारंपरिक मुखौटों को सुरक्षित रखने के लिए स्थायी भवन तक उपलब्ध नहीं है।
उन्होंने कहा कि जीवन भर छऊ कला को बचाने और आगे बढ़ाने में समर्पित रहने के बावजूद कलाकारों को आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देने का काम जारी है, लेकिन संसाधनों की कमी इस प्रयास को कठिन बना रही है।
युवाओं का घटता रुझान बढ़ा रहा चिंता
छऊ कला के भविष्य को लेकर परिक्षित महतो सबसे अधिक चिंतित हैं। उनका मानना है कि आधुनिक जीवनशैली और रोजगार की तलाश में युवा पीढ़ी अपनी लोकसंस्कृति से दूर होती जा रही है। एक समय था जब गांवों में छऊ सीखने के लिए युवाओं की लंबी कतारें लगती थीं, लेकिन अब इस कला को पेशे के रूप में अपनाने वाले युवाओं की संख्या लगातार घट रही है।
उनका कहना है कि यदि कलाकारों को आर्थिक सुरक्षा, प्रशिक्षण केंद्रों को पर्याप्त संसाधन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नियमित अवसर मिलें, तो युवा फिर से इस कला की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
राष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शन, भुगतान अब तक लंबित
परिक्षित महतो ने बताया कि उन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर झारखंड का प्रतिनिधित्व किया है। दिल्ली के राजपथ पर भी उन्होंने अपनी मंडली के साथ छऊ नृत्य प्रस्तुत किया था। हालांकि, उनका दावा है कि उस कार्यक्रम से संबंधित भुगतान आज तक उन्हें प्राप्त नहीं हुआ है। उनका कहना है कि इस तरह की परिस्थितियां कलाकारों का मनोबल कमजोर करती हैं।
सरकार से की विशेष पहल की मांग
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकार ने राज्य सरकार और प्रशासन से छऊ कला के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने कलाकारों के लिए स्थायी प्रशिक्षण केंद्र, वाद्ययंत्र एवं मुखौटा संग्रहालय, आर्थिक सहायता और नियमित सांस्कृतिक आयोजनों की व्यवस्था सुनिश्चित करने की अपील की है।
“कला बचेगी तो संस्कृति बचेगी”
परिक्षित महतो का मानना है कि छऊ केवल एक नृत्य शैली नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक आत्मा है। इसमें लोकजीवन, पौराणिक कथाओं, आदिवासी और सदान समाज की परंपराओं की झलक दिखाई देती है। यदि यह कला कमजोर पड़ती है तो झारखंड की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पहचान भी धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है।
उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की है कि लोककलाओं और कलाकारों के संरक्षण को केवल चर्चा का विषय न बनाया जाए, बल्कि उनके लिए ठोस योजनाएं और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। क्योंकि कलाकार बचेंगे, तभी लोककलाएं बचेंगी और लोककलाएं बचेंगी, तभी हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह पाएगी।“छऊ बचेगी तो संस्कृति बचेगी”: राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता परिक्षित महतो की भावुक अपी
