26 साल बाद ‘कर्ज’ चुकाने की सियासत: सम्राट चौधरी कैसे बने नीतीश की पहली पसंद
पटना: बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही एक पुरानी राजनीतिक कहानी फिर चर्चा में आ गई है—वो कहानी, जो 26 साल पहले शुरू हुई थी और अब जाकर पूरी हुई मानी जा रही है।
कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार ने यह फैसला सिर्फ मौजूदा राजनीति को ध्यान में रखकर नहीं लिया, बल्कि एक पुराने राजनीतिक ‘कर्ज’ को उतारने के लिए भी किया है—यह कर्ज था शकुनी चौधरी का।
2000 से 2026: एक अधूरी कहानी का पूरा होना
साल 2000 में जब नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने, तो उनकी सरकार सिर्फ 7 दिन ही चल पाई थी। उस समय उन्हें सत्ता तक पहुंचाने में शकुनी चौधरी जैसे नेताओं की अहम भूमिका थी।
90 के दशक में जब लालू यादव का दबदबा चरम पर था, तब शकुनी चौधरी ने नीतीश का साथ दिया और संगठन को मजबूत किया। खासकर कुशवाहा (कोइरी) समाज को लामबंद करने में उनकी बड़ी भूमिका रही, जिसने आगे चलकर 2005 में नीतीश को बहुमत दिलाने में मदद की।
अब, 26 साल बाद, उसी राजनीतिक रिश्ते की ‘वापसी’ सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर देखी जा रही है।
सम्राट चौधरी: संघर्ष, विवाद और उभार की कहानी
1. जेल से शुरू हुई राजनीति
सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा। 1995 में एक राजनीतिक मामले में उन्हें जेल जाना पड़ा। खुद सम्राट कई बार कह चुके हैं कि अगर उस समय लालू यादव ने कार्रवाई नहीं की होती, तो शायद वे राजनीति में नहीं आते।
2. 19 साल की उम्र में मंत्री बनने का विवाद
जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ज्वाइन किया। बताया जाता है कि महज 19 साल की उम्र में मंत्री बनने को लेकर विवाद भी हुआ और बाद में पद से हटना पड़ा। यह घटना उनके करियर का शुरुआती बड़ा मोड़ थी।
3. पिता से किया वादा
सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी खुद मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। ऐसे में सम्राट ने उनसे वादा किया था—“मैं बनकर दिखाऊंगा।” अब मुख्यमंत्री बनकर उन्होंने उस वादे को पूरा कर दिया।
4. मुरेठा और राजनीतिक संकल्प
2022 में जब नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ छोड़ा, तब सम्राट चौधरी ने मुरेठा बांधकर उन्हें सत्ता से हटाने का संकल्प लिया था। बाद में जब राजनीतिक समीकरण बदले और NDA में वापसी हुई, तो उन्होंने अयोध्या में सरयू स्नान कर मुरेठा उतार दिया।
क्यों बने नीतीश और NDA की पहली पसंद?
लव-कुश समीकरण का संतुलन
बिहार की राजनीति में ‘लव-कुश’ (कुर्मी + कुशवाहा) समीकरण काफी प्रभावशाली रहा है। नीतीश कुमार खुद कुर्मी समाज से आते हैं, जबकि सम्राट चौधरी कुशवाहा समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इस संतुलन के जरिए NDA ने एक बार फिर अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश की है।
भरोसे का चेहरा
पिछले दो वर्षों में सम्राट चौधरी ने लगातार संगठन और सरकार में सक्रिय भूमिका निभाई। डिप्टी सीएम रहते हुए उन्होंने नीतीश के साथ तालमेल बनाए रखा और खुद को एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में स्थापित किया।
संकेत पहले ही मिल चुके थे
मार्च 2026 में विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान नीतीश कुमार ने कई बार सार्वजनिक रूप से सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाते हुए संकेत दिए थे कि वे भविष्य में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
राजनीति से आगे की कहानी
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना सिर्फ एक पद परिवर्तन नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में सामाजिक समीकरण, पुराने रिश्तों और नई रणनीति का मेल है।
यह फैसला बताता है कि बिहार की राजनीति में सिर्फ वर्तमान नहीं, बल्कि अतीत के रिश्ते और संतुलन भी उतने ही मायने रखते हैं।
