Jharkhand News: झारखंड में आगामी 10 जून से नदियों से बालू उठाव पर पूर्ण प्रतिबंध लागू होने जा रहा है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) के निर्देश के तहत 15 अक्टूबर तक बालू खनन और उठाव पर रोक रहेगी। ऐसे में राज्य में बालू संकट गहराने की आशंका तेज हो गई है। स्थिति यह है कि मानसून से पहले बालू आपूर्ति को लेकर सरकारी तैयारियां लगभग ठप नजर आ रही हैं। झारखंड राज्य खनिज विकास निगम (JSMDC) से बालू घाटों का नियंत्रण जिला प्रशासन को सौंपे जाने के बावजूद धरातल पर अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई है।
सिर्फ 13 घाटों से ही संभव हो पा रही वैध सप्लाई: Jharkhand News
राज्य में कुल 444 बालू घाट चिन्हित हैं। इनमें से 298 घाटों की नीलामी प्रक्रिया पूरी हुई, लेकिन वैधानिक प्रक्रियाओं और पर्यावरण मंजूरी की बाधाओं के कारण स्थिति गंभीर बनी हुई है। जानकारी के अनुसार नीलामी में सफल ठेकेदारों में से केवल 35 ही जरूरी प्रक्रियाएं पूरी कर सके हैं। इनमें भी सिर्फ 13 घाटों को ही जिला प्रशासन की ओर से एग्रीमेंट और संचालन की मंजूरी मिल पाई है। यानी मानसून से ठीक पहले पूरे राज्य में सिर्फ 13 घाटों से ही वैध रूप से बालू की आपूर्ति संभव है।
मांग और सप्लाई के बीच 60 फीसदी का अंतर: Jharkhand News
झारखंड में रोजाना करीब 1.5 लाख से 2 लाख सीएफटी बालू की जरूरत होती है। निर्माण कार्यों के पीक सीजन में यह मांग और बढ़ जाती है। लेकिन वर्तमान स्थिति में वैध आपूर्ति में करीब 60 फीसदी की भारी कमी आ चुकी है। इस कमी का असर राज्य की कई महत्वपूर्ण योजनाओं पर पड़ने लगा है। अबुआ आवास, पीएम आवास योजना, सड़क निर्माण, पुल-पुलिया और निजी निर्माण कार्यों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। बालू की कमी के कारण निर्माण लागत बढ़ने और अवैध कारोबार बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है।
लाखों लोगों के सामने रोजगार संकट: Jharkhand News
बालू उठाव बंद होने का सबसे बड़ा असर मजदूरों और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों पर पड़ेगा। अनुमान के मुताबिक बालू घाटों पर सीधे तौर पर काम करने वाले 50 से 70 हजार मजदूरों का रोजगार प्रभावित होगा। वहीं निर्माण कार्य ठप होने से करीब 3 से 4 लाख लोग अप्रत्यक्ष रूप से संकट में आ सकते हैं। इनमें राजमिस्त्री, दिहाड़ी मजदूर, ट्रक और हाइवा चालक, वाहन मालिक और निर्माण सामग्री से जुड़े कारोबारी शामिल हैं।
उपायुक्तों के पास लंबित हैं फाइलें: Jharkhand News
सूत्रों के अनुसार 22 बालू घाटों से संबंधित एग्रीमेंट फाइलें अब भी विभिन्न जिलों के उपायुक्त कार्यालयों में लंबित हैं। दुमका, खूंटी, रामगढ़, रांची, हजारीबाग, गोड्डा, लातेहार, जामताड़ा और पूर्वी सिंहभूम जैसे जिलों में फाइलें मंजूरी का इंतजार कर रही हैं। यदि समय रहते इन फाइलों पर निर्णय नहीं हुआ, तो मानसून के दौरान झारखंड में बालू संकट और गंभीर हो सकता है।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
बालू संकट अब सिर्फ खनन का मामला नहीं रह गया है। यह रोजगार, निर्माण, सरकारी योजनाओं और कानून व्यवस्था से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। अब देखना होगा कि राज्य सरकार मानसून से पहले लंबित प्रक्रियाओं को कितनी तेजी से पूरा कर पाती है और निर्माण सेक्टर को राहत देने के लिए क्या कदम उठाती है।
