दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि: संघर्ष की वह मशाल, जो आज भी झारखंड का रास्ता रोशन कर रही है
4 अगस्त… यह तारीख झारखंड के इतिहास में हमेशा भावनाओं, संघर्ष और संकल्प के साथ याद की जाएगी। आज ही के दिन, वर्ष 2025 में 81 वर्ष की आयु में दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने इस दुनिया को अलविदा कहा था। लेकिन ऐसे जननायक कभी विदा नहीं होते, वे अपनी विचारधारा, संघर्ष और विरासत के रूप में हमेशा लोगों के बीच जीवित रहते हैं।
झारखंड का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, एक नाम हर पन्ने पर सम्मान के साथ दर्ज होगा—दिशोम गुरु शिबू सोरेन। वह नेता, जिसने जल, जंगल, जमीन और आदिवासी-मूलवासी अस्मिता की लड़ाई को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। जिसने सत्ता से पहले संघर्ष को चुना और पद से पहले अपने लोगों के अधिकारों को महत्व दिया।
आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर पूरा झारखंड उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। गांव-गांव में श्रद्धांजलि सभाएं हो रही हैं, शहरों में विचार गोष्ठियां आयोजित की जा रही हैं और हर ओर एक ही स्वर गूंज रहा है—“दिशोम गुरु अमर रहें।”
इस अवसर पर सबसे बड़ा कार्यक्रम उनके पैतृक गांव नेमरा, लुकैयाटांड़ (रामगढ़) में आयोजित किया गया। यहां मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दिशोम गुरु की 14 फीट ऊंची आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया। हजारों लोगों की मौजूदगी में गुरुजी के संघर्ष, त्याग और झारखंड आंदोलन में उनके ऐतिहासिक योगदान को याद किया गया। पूरा नेमरा भावनाओं और श्रद्धा के वातावरण में डूबा रहा।
गुरुजी का जीवन केवल राजनीतिक यात्रा नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय और जनअधिकारों की सतत लड़ाई का प्रतीक था। उन्होंने उन लोगों की आवाज बनने का संकल्प लिया, जिनकी आवाज सत्ता तक नहीं पहुंचती थी। उनके लिए राजनीति कभी सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं रही, बल्कि समाज परिवर्तन का रास्ता रही।
श्रद्धांजलि कार्यक्रम के साथ नेमरा में विशाल विकास मेले का भी आयोजन किया गया, जहां राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत लाभुकों के बीच करोड़ों रुपये की परिसंपत्तियों और ऋण का वितरण किया गया। इसे दिशोम गुरु के समावेशी विकास और सामाजिक न्याय के सपनों को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
अगर शिबू सोरेन को समझना है, तो उनके संघर्ष की शुरुआत को समझना होगा। 11 जनवरी 1944 को नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया। महाजनों द्वारा उनके पिता की हत्या ने उनके भीतर अन्याय के खिलाफ संघर्ष की ऐसी चिंगारी जलाई, जिसने आगे चलकर पूरे झारखंड आंदोलन को नई दिशा दी।
1970 के दशक में टुंडी के जंगलों से शुरू हुआ महाजनी प्रथा के खिलाफ ‘धनकटी आंदोलन’ धीरे-धीरे जनआंदोलन बन गया। यही आंदोलन आगे चलकर अलग झारखंड राज्य की मांग का मजबूत आधार बना।
दशकों तक चले संघर्ष, हजारों आंदोलनों और अनगिनत बलिदानों के बाद 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य का सपना साकार हुआ। इस ऐतिहासिक आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा दिशोम गुरु शिबू सोरेन ही थे।
अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री, भारत सरकार में केंद्रीय कोयला मंत्री रहे और राष्ट्र ने उनके योगदान का सम्मान करते हुए उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया।
दिशोम गुरु केवल एक राजनेता नहीं थे। वे एक विचार थे, एक आंदोलन थे और झारखंड की आत्मा थे। उन्होंने यह साबित किया कि जनसंघर्ष से निकला नेतृत्व समाज की दिशा बदल सकता है।
आज, उनकी पहली पुण्यतिथि पर पूरा झारखंड केवल उन्हें श्रद्धांजलि नहीं दे रहा, बल्कि उनके संघर्ष, उनके विचार और उनके सपनों को आगे बढ़ाने का संकल्प भी दोहरा रहा है।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष, उनकी सोच और उनकी विरासत झारखंड की मिट्टी, यहां के लोगों और आने वाली पीढ़ियों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगी।
