Jharkhand News: खूंटी का लेबेद, नक्सल छाया से निकला, अब एक पुल के इंतजार में पूरा गांव

कभी गोलियों की गूंज, अब विकास की आस… लेबेद में अधूरा पुल बना बड़ी बाधा

Jharkhand News: झारखंड के खूंटी जिले का लेबेद गांव कभी डर, संघर्ष और नक्सल गतिविधियों के लिए जाना जाता था। एक समय ऐसा भी था जब यहां मुंडा और पाहन खूंट के बीच गहरा विवाद था, जिसने कई जिंदगियों को छीन लिया। हालात इतने गंभीर हो गए थे कि गांव के कुछ लोगों को अपना घर छोड़ने तक की नौबत आ गई थी। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नक्सलियों ने भी पंपलेट जारी कर बुद्धिजीवियों और प्रशासन से हस्तक्षेप की अपील की थी। लेकिन वक्त के साथ यह तस्वीर बदल चुकी है।

अब शांति की राह पर लेबेद: Jharkhand News

आज लेबेद गांव पूरी तरह नक्सलमुक्त हो चुका है। इसमें सीआरपीएफ 94 बटालियन, जिला पुलिस और स्थानीय ग्रामीणों की बड़ी भूमिका रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब गांव में आपसी विवाद भी खत्म हो चुके हैं और लोग शांति से जीवन जी रहे हैं। जहां कभी डर का माहौल था, वहीं अब उम्मीद और विकास की बातें हो रही हैं।

विकास की राह में अधूरा पुल बना रोड़ा: Jharkhand News

हालांकि, शांति के बावजूद लेबेद और आसपास के 17 गांव-टोलों के विकास की राह में एक बड़ी बाधा अब भी खड़ी है करकरी नदी पर पुल का निर्माण। अगर यह पुल बन जाए, तो लेबेद, बांदूगड़ा, तिरिलडीह, साऊमारंगबेड़ा, चंडीपिडी, जोजोबेड़ा, लोबो, डीऊ, सुलाडीह, उलीलोर, सलीलोर, पतड़ा, सरूवामदा, मनीबेड़ा, रूम्बई, पोटोबेड़ा और मारंगबेड़ा जैसे कई गांवों को सीधा फायदा मिलेगा। फिलहाल, ग्रामीणों को अड़की पहुंचने के लिए तोड़ांग के रास्ते करीब 16 किलोमीटर का लंबा सफर तय करना पड़ता है, जबकि पुल बनने के बाद यह दूरी घटकर 8 किलोमीटर रह जाएगी।

जर्जर सड़क बनी दूसरी बड़ी समस्या: Jharkhand News

लेबेद से तोड़ांग तक की करीब 5 किलोमीटर सड़क की हालत बेहद खराब है। सड़क उखड़ चुकी है, जगह-जगह पत्थर बिखरे हैं और चढ़ाई इतनी अधिक है कि चारपहिया वाहन भी संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते हैं। लंबे समय से मरम्मत नहीं होने के कारण ग्रामीणों में नाराजगी साफ झलकती है।

खेती और आजीविका पर असर

करकरी नदी सालभर बहती है, लेकिन परिवहन की समस्या के कारण किसान इसका पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। ग्रामीण तरबूज, स्वीटकॉर्न और सब्जियों की खेती करना चाहते हैं, लेकिन बाजार तक पहुंच आसान न होने के कारण उनकी कोशिशें अधूरी रह जाती हैं।

एक पुल से बदल सकती है तस्वीर

ग्रामीणों का मानना है कि यदि करकरी नदी पर पुल बन जाए, तो न सिर्फ आवागमन आसान होगा, बल्कि खेती, रोजगार और पूरे क्षेत्र के विकास को नई दिशा मिलेगी। लेबेद गांव, जिसने कभी नक्सल छाया और आपसी संघर्ष का कठिन दौर देखा, आज शांति और विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस सफर को पूरा करने के लिए एक मजबूत पुल की जरूरत है। क्योंकि कभी-कभी एक पुल सिर्फ रास्ता नहीं जोड़ता, बल्कि उम्मीदों को भी जोड़ता है।

 

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