रांची: जब पूरी दुनिया World Heritage Day मना रही है, उसी बीच झारखंड से एक ऐसी ऐतिहासिक खोज सामने आई है जो राज्य के गौरव को नई पहचान दे रही है।
गोड्डा जिले के पत्थरगामा (कस्तूरिया गांव) में खुदाई के दौरान दुर्लभ ‘ताम्र निधियां’ मिली हैं, जो लगभग 2000 ईसा पूर्व के कालखंड से जुड़ी मानी जा रही हैं।
इन प्राचीन वस्तुओं को अब Jharkhand State Museum में प्रदर्शित किया जाएगा, जहां लोग हड़प्पा काल के समकालीन संस्कृति की झलक देख सकेंगे।
World Heritage Day: अचानक मिलीं हजारों साल पुरानी धरोहर
यह खोज तब सामने आई जब गांव में तालाब की खुदाई की जा रही थी। जैसे ही तांबे के प्राचीन औजार और वस्तुएं मिलीं, स्थानीय प्रशासन ने तुरंत उन्हें सुरक्षित कर लिया। फिलहाल ये धरोहर सुरक्षित अभिरक्षा में रखी गई हैं और जल्द ही रांची के होटवार स्थित संग्रहालय में प्रदर्शित होंगी।
झारखंड का इतिहास और भी समृद्ध
विशेषज्ञों के अनुसार, ये ताम्र निधियां ‘कैल्कोलिथिक एज’ यानी ताम्र-पाषाण युग से संबंधित हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि झारखंड में हजारों साल पहले भी विकसित सभ्यता और तकनीक मौजूद थी।
इतिहासकारों का मानना है कि यह क्षेत्र केवल जंगलों और खनिजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्राचीन काल में यह एक उन्नत सांस्कृतिक और औद्योगिक केंद्र भी था।
World Heritage Day: हड़प्पा काल से जुड़ाव के संकेत
इन ताम्र निधियों का समय 1700 से 1200 ईसा पूर्व के बीच माना जा रहा है—यानी वह दौर जब Indus Valley Civilization अपने अंतिम चरण में थी और वैदिक काल की शुरुआत हो रही थी।
विशेषज्ञों के अनुसार, झारखंड का सिंहभूम क्षेत्र उस समय तांबे का प्रमुख स्रोत था, जहां से धातु अन्य क्षेत्रों में भेजी जाती थी।
‘ताम्र-निधि संस्कृति’ का मजबूत केंद्र
पुरातत्वविदों के मुताबिक, यह खोज ‘Copper Hoard Culture’ यानी ताम्र-निधि संस्कृति से जुड़ी है। यह संस्कृति अपने भारी तांबे के औजारों, तलवारों और अनोखी आकृतियों के लिए जानी जाती है।
झारखंड के हजारीबाग, गिरिडीह, पश्चिमी सिंहभूम और रांची जैसे इलाकों में पहले भी ऐसे प्रमाण मिल चुके हैं, जो यह दर्शाते हैं कि छोटानागपुर क्षेत्र इस संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र था।
शोध और पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
इन धरोहरों के संग्रहालय में प्रदर्शित होने से न सिर्फ इतिहासकारों और शोधार्थियों को नई जानकारी मिलेगी, बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। यह खोज झारखंड के प्राचीन इतिहास को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
