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बिहार में डिप्टी CM पद पर सस्पेंस, सरकारी नोटिफिकेशन से गायब हुआ पदनाम

नोटिफिकेशन से शुरू हुआ विवाद, क्या JDU कमजोर पड़ रही है?

बिहार में डिप्टी CM पद पर सस्पेंस! नोटिफिकेशन से गायब हुआ पदनाम, नीतीश से मिलने पहुंचे JDU नेता

बिहार की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या राज्य में डिप्टी सीएम का पद खत्म हो गया है? इसकी वजह बनी सरकार की नई अधिसूचना, जिसमें उपमुख्यमंत्री पद का जिक्र नहीं किया गया।

दरअसल, 7 मई को हुए सम्राट कैबिनेट विस्तार के बाद जारी सरकारी नोटिफिकेशन में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का पद स्पष्ट रूप से लिखा गया, लेकिन विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव के नाम के आगे “उप मुख्यमंत्री” नहीं लिखा गया।

JDU नेताओं की नीतीश से मुलाकात

इसी बीच रविवार सुबह संजय झा, ललन सिंह, लेसी सिंह और अशोक चौधरी पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने 7 सर्कुलर रोड पहुंचे।

बताया जा रहा है कि बैठक में मंत्रियों के कामकाज और सरकार के भीतर चल रही चर्चाओं पर बातचीत हुई।

पुराने और नए नोटिफिकेशन में बड़ा अंतर

15 अप्रैल 2026 को जारी अधिसूचना में स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री हैं और विजय चौधरी तथा बिजेंद्र यादव उप मुख्यमंत्री हैं।

लेकिन 7 मई 2026 को जारी नए नोटिफिकेशन में दोनों नेताओं के नाम के आगे केवल मंत्री के रूप में विभागों का उल्लेख किया गया।

यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने JDU के दोनों उपमुख्यमंत्रियों से उनका पद वापस ले लिया है।

क्या यह सिर्फ प्रिंटिंग मिस्टेक है?

सरकार की ओर से सफाई दी गई है कि डिप्टी सीएम का पद खत्म नहीं हुआ है। अधिकारियों का कहना है कि हर नोटिफिकेशन में पदनाम लिखना जरूरी नहीं होता।

वहीं विजय कुमार चौधरी ने इसे “प्रिंटिंग की भूल” बताते हुए कहा कि विभाग इस त्रुटि को सुधार लेगा।

मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग के सचिव अरविंद कुमार चौधरी ने भी कहा कि 15 अप्रैल की अधिसूचना ही मान्य है, जिसमें दोनों नेताओं को उप मुख्यमंत्री बताया गया था।

राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज

हालांकि विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे मामले को सिर्फ तकनीकी गलती मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि इतनी महत्वपूर्ण अधिसूचना कई स्तरों से गुजरती है, इसलिए इतनी बड़ी चूक सामान्य नहीं मानी जा सकती।

अब बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ प्रशासनिक भूल है या फिर बिहार की राजनीति में कोई बड़ा संदेश छिपा है।

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