राज्यसभा चुनाव 2026: झारखंड में ‘माटी बनाम मैनेजमेंट’ की जंग, क्या परिमल नाथवानी फिर दोहराएंगे इतिहास?
रांची: झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए होने वाला चुनाव अब केवल संख्या बल का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य की राजनीति के भीतर चल रही अंडरकरंट का बड़ा परीक्षण बन गया है। एक ओर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और महागठबंधन स्थानीयता, दलित प्रतिनिधित्व और झारखंडी अस्मिता का मुद्दा लेकर मैदान में हैं, तो दूसरी ओर भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी अपनी राजनीतिक नेटवर्किंग और प्रबंधन क्षमता के दम पर चुनावी समीकरण बदलने की कोशिश में जुटे हैं।
परिमल नाथवानी की एंट्री से बढ़ी राजनीतिक हलचल
झारखंड की राजनीति में परिमल नाथवानी का नाम हमेशा से अप्रत्याशित राजनीतिक समीकरणों से जुड़ा रहा है। वर्ष 2008 के राज्यसभा चुनाव में उन्होंने उस समय सबको चौंका दिया था, जब झामुमो के पास पर्याप्त विधायक होने के बावजूद उनके उम्मीदवार को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और नाथवानी जीतकर राज्यसभा पहुंच गए।
इसके बाद 2014 में भी उन्होंने बिना किसी बड़े मुकाबले के राज्यसभा का रास्ता तय किया। अब 2026 में उनकी तीसरी पारी की कोशिश ने चुनाव को बेहद रोचक बना दिया है।
जीत के लिए चाहिए 28 वोट
झारखंड विधानसभा की वर्तमान स्थिति में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 वोटों की आवश्यकता है।
एनडीए के पास फिलहाल 24 विधायक हैं, जिनमें भाजपा, आजसू, जदयू और लोजपा के सदस्य शामिल हैं। ऐसे में परिमल नाथवानी को जीत के लिए कम से कम चार अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी।
यही चार वोट इस चुनाव के सबसे बड़े राजनीतिक रहस्य बन गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि नाथवानी इन अतिरिक्त वोटों का इंतजाम कर लेते हैं, तो यह महागठबंधन के भीतर बड़ी सेंधमारी मानी जाएगी।
महागठबंधन के पास मजबूत संख्या बल
सैद्धांतिक रूप से महागठबंधन की स्थिति मजबूत दिखाई देती है।
- झामुमो – 34 विधायक
- कांग्रेस – 16 विधायक
- राजद – 4 विधायक
- भाकपा माले – 2 विधायक
कुल मिलाकर महागठबंधन के पास 56 विधायक हैं, जो दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त माने जा रहे हैं।
झामुमो ने बैद्यनाथ राम को उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस की ओर से प्रणव झा मैदान में हैं।
बैद्यनाथ राम के जरिए दलित और स्थानीय कार्ड
झामुमो ने बैद्यनाथ राम को उम्मीदवार बनाकर स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है। पार्टी इसे झारखंडी पहचान, स्थानीय प्रतिनिधित्व और दलित समाज को सम्मान देने के रूप में पेश कर रही है।
पार्टी नेताओं का दावा है कि पहली बार झारखंड का एक मूल निवासी दलित नेता राज्यसभा पहुंच सकता है। इसी वजह से झामुमो इस चुनाव को केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व की लड़ाई के रूप में भी प्रचारित कर रहा है।
नाथवानी का दावा- झारखंड मेरी कर्मभूमि
नामांकन दाखिल करने के बाद परिमल नाथवानी ने कहा कि उनका झारखंड से पुराना रिश्ता रहा है।
उन्होंने कहा कि वे पहले भी राज्य के विकास में योगदान दे चुके हैं और आगे भी मौका मिला तो अधिक मजबूती से काम करेंगे। नाथवानी ने यह भी कहा कि उनके संबंध सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से हैं और वे खुद को कभी बाहरी नहीं मानते।
उनका यह बयान साफ संकेत देता है कि वे केवल एनडीए के वोटों पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि अन्य दलों के विधायकों तक भी अपनी पहुंच होने का संदेश देना चाहते हैं।
क्या होगा क्रॉस वोटिंग का खेल?
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा संभावित क्रॉस वोटिंग को लेकर हो रही है। हालांकि महागठबंधन सार्वजनिक तौर पर पूरी एकजुटता का दावा कर रहा है, लेकिन झारखंड की राजनीतिक इतिहास को देखते हुए कोई भी दल पूरी तरह निश्चिंत नजर नहीं आ रहा।
आने वाले दिनों में विधायकों की निगरानी, बैठकें, रणनीतिक संवाद और राजनीतिक सक्रियता बढ़ने की संभावना है। यही वजह है कि राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है।
18 जून को होगा असली फैसला
अब सारी निगाहें 18 जून को होने वाले मतदान पर टिकी हैं। यह चुनाव केवल दो राज्यसभा सीटों का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि झारखंड की राजनीति में स्थानीयता और सामाजिक प्रतिनिधित्व का नैरेटिव ज्यादा मजबूत है या फिर राजनीतिक प्रबंधन और रणनीतिक नेटवर्किंग का प्रभाव भारी पड़ता है।
फिलहाल इतना तय है कि झारखंड राज्यसभा चुनाव 2026 अब एक हाई-वोल्टेज राजनीतिक मुकाबले में बदल चुका है, जिसका परिणाम राज्य की राजनीति में दूरगामी असर छोड़ सकता है।
