
Jharkhand Urja Vikas Nigam: प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की तैयारी, कर्मचारियों से 15 दिन में मांगी आपत्तियां
रांची: झारखंड ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (JUVNL) और इसकी अनुषंगी कंपनियों में पदों की डेजिग्नेशन मैपिंग, सेवा संवर्ग और संगठनात्मक संरचना से जुड़ी विसंगतियों को दूर करने की पहल की गई है। निगम मुख्यालय ने इस संबंध में गठित उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशें सार्वजनिक करते हुए संबंधित कर्मचारियों और अन्य हितधारकों से दावे एवं आपत्तियां मांगी हैं।
महाप्रबंधक (कार्मिक-सह-सामान्य प्रशासन) शैलेश कुमार सिंह की ओर से जारी आदेश के अनुसार, संबंधित पक्षों को 15 दिनों के भीतर अपने दावे और आपत्तियां लिखित रूप में नियंत्री पदाधिकारी के माध्यम से मुख्यालय भेजने हैं। इसके बाद प्रस्ताव को निदेशक मंडल की आगामी बैठक में अंतिम निर्णय के लिए रखा जा सकता है।
यह प्रक्रिया वर्ष 2018 और 2022 में अधिसूचित डेजिग्नेशन मैपिंग, संगठनात्मक संरचना और मैनपावर प्लानिंग से जुड़ी समस्याओं की समीक्षा के लिए शुरू की गई है।
पुराने और नए कैडर ढांचे के बीच विसंगतियां
समिति ने अपनी रिपोर्ट में पूर्ववर्ती झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड के समय की सेवा संरचना और वर्तमान कॉर्पोरेट ढांचे के बीच तालमेल से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2018 के बाद लागू नए ढांचे में सचिवालय, फील्ड कैडर, कार्मिक और स्टोर जैसे कुछ संवर्गों तथा पूर्व के पदों का स्पष्ट समायोजन नहीं होने से कर्मचारियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।
समिति ने यह भी बताया है कि पुराने ढांचे में तृतीय श्रेणी के तकनीकी और गैर-तकनीकी कर्मचारियों के लिए प्रोन्नति के अधिक अवसर उपलब्ध थे, जबकि नए ढांचे में अवसर सीमित होने की शिकायतें सामने आई हैं।
इसके अलावा, चतुर्थ श्रेणी के पदों को सपोर्ट स्टाफ के अलग-अलग स्तरों में बांटने से वेतनमान और पदों के निर्धारण में विसंगतियां पैदा होने की बात कही गई है।
तकनीकी पदों के लिए योग्यता का सवाल
समिति ने तकनीकी पदों पर नियुक्ति और पदों के समायोजन के संदर्भ में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, पावर हाउस और ग्रिड सबस्टेशनों के पर्यवेक्षण से जुड़े कुछ पदों के लिए इंजीनियरिंग डिग्री या डिप्लोमा जरूरी है, जबकि सहायक तकनीकी कार्यों के लिए आईटीआई प्रमाणपत्र निर्धारित हो सकता है।
इसी आधार पर समिति ने कहा है कि आईटीआई योग्यताधारी तृतीय श्रेणी के तकनीकी कर्मचारियों का सीधे डिप्लोमा या डिग्री इंजीनियरों के कनीय प्रबंधक अथवा प्रबंधक पदों पर समायोजन नहीं किया जा सकता। पदों का निर्धारण संबंधित योग्यता और सेवा नियमों के अनुरूप करने की सिफारिश की गई है।
समिति ने ऊर्जा विभाग के उस प्रावधान का भी उल्लेख किया है, जिसके अनुसार कर्मचारियों की सेवा शर्तें पूर्व की तुलना में प्रतिकूल नहीं होनी चाहिए।
सेवानिवृत्त कर्मचारियों और पेंशन लाभ पर भी सुझाव
समिति ने 7 अगस्त 2018 के बाद सेवानिवृत्त हुए या सेवा में रहे कर्मचारियों के मामलों पर भी सुझाव दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जिन कर्मचारियों को नियमों के तहत कोई लाभ या प्रोन्नति देय पाई जाती है, उनके लिए काल्पनिक लाभ और पेंशन निर्धारण पर विचार करने की सिफारिश की गई है।
इसके अलावा, जिन संवर्गों को वर्तमान ढांचे में समायोजित करना संभव नहीं है, उनके लिए अलग कैडर या पद सृजित करने का सुझाव दिया गया है। इसका उद्देश्य कर्मचारियों के सेवा संबंधी हितों और अधिकारों से जुड़े विवादों को कम करना है।
कंसल्टेंट की जवाबदेही तय करने की सिफारिश
समिति ने भविष्य में प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलावों के लिए नियुक्त किए जाने वाले कंसल्टेंट्स की जवाबदेही तय करने का सुझाव भी दिया है।
रिपोर्ट में अनुबंध के तहत सफल क्रियान्वयन की शर्त शामिल करने और भुगतान की 20 प्रतिशत राशि रोककर रखने जैसी व्यवस्था की सिफारिश की गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तैयार की गई संगठनात्मक योजना को लागू करने के दौरान सामने आने वाली समस्याओं के लिए भी जवाबदेही तय हो सके।
अब निदेशक मंडल के फैसले पर नजर
निगम ने संबंधित हितधारकों को अपनी आपत्तियां और सुझाव दर्ज कराने के लिए 15 दिनों का समय दिया है। इस अवधि में प्राप्त प्रतिक्रियाओं की समीक्षा के बाद प्रस्ताव निदेशक मंडल के सामने रखा जा सकता है।
फिलहाल समिति की सिफारिशें अंतिम निर्णय नहीं हैं। कैडर संरचना, पदों की मैपिंग, वेतनमान और प्रोन्नति से जुड़े बदलावों पर अंतिम स्थिति निदेशक मंडल के निर्णय और लागू होने वाले आदेशों के बाद ही स्पष्ट होगी।



