Ranchi: झारखंड में जेटेट (JTET) परीक्षा में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को शामिल करने को लेकर जारी विवाद अब और गहरा गया है। इस मुद्दे पर गठित पांच मंत्रियों की हाई लेवल कमेटी की अहम बैठक शुक्रवार को हुई, लेकिन किसी अंतिम निष्कर्ष पर सहमति नहीं बन सकी। अब इस पूरे मामले पर अंतिम फैसला मुख्यमंत्री Hemant Soren और राज्य कैबिनेट के स्तर पर होगा।
भाषा चयन के मौजूदा नियम पर उठा विवाद: Hemant Soren
फिलहाल JTET परीक्षा के पार्ट-2 में अभ्यर्थियों को 15 जनजातीय भाषाओं में से किसी एक भाषा का चयन करना अनिवार्य है। इसी व्यवस्था को लेकर कमेटी के कई सदस्यों ने आपत्ति जताई। बैठक में यह तर्क दिया गया कि गढ़वा, पलामू और चतरा जैसे सीमावर्ती जिलों में नागपुरी और कई जनजातीय भाषाएं बोलने वालों की संख्या काफी कम है। ऐसे में वहां के लाखों स्थानीय अभ्यर्थी बिना किसी गलती के प्रतियोगिता से बाहर हो सकते हैं।
सरकार आंकड़े पेश नहीं कर सकी: Hemant Soren
बैठक के दौरान शिक्षा और कार्मिक विभाग पिछली JTET परीक्षाओं से जुड़ा जरूरी डेटा भी प्रस्तुत नहीं कर पाए। कमेटी ने पहले पूछा था कि पिछली परीक्षाओं में किन भाषाओं का चयन कितने अभ्यर्थियों ने किया था, लेकिन विभाग स्पष्ट आंकड़े देने में असफल रहा। इसको लेकर भी सदस्यों ने नाराजगी जताई और कहा कि जिस मुद्दे पर इतना बड़ा विवाद चल रहा है, उसी पर सरकार के पास पूरा डेटा उपलब्ध नहीं है।
भोजपुरी, मैथिली और अंगिका के पक्ष में दिए गए तर्क: Hemant Soren
बैठक में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को शामिल करने के समर्थन में कई ऐतिहासिक और संवैधानिक तर्क रखे गए। सदस्यों ने बताया कि वर्ष 2012 और 2019 की नियमावलियों में इन भाषाओं को पहले शामिल किया जा चुका है। इसके अलावा मैथिली को झारखंड की दूसरी राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में इन भाषाओं को हटाए जाने पर सवाल उठ रहे हैं।
कमेटी की संरचना पर भी उठा सवाल: Hemant Soren
बैठक में नया मोड़ तब आया जब मंत्री Sudivya Kumar ने कमेटी की संरचना पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भाषा और सांस्कृतिक पहचान जैसे संवेदनशील मुद्दे पर गठित कमेटी में आदिवासी और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए था। हालांकि उन्हें जवाब दिया गया कि कमेटी का विस्तार करना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है।
अब मुख्यमंत्री को सौंपी जाएगी रिपोर्ट: Hemant Soren
वित्त मंत्री Radha Krishna Kishore ने कहा कि बैठक की पूरी रिपोर्ट अगले दो से तीन दिनों में मुख्यमंत्री और कैबिनेट को सौंप दी जाएगी। अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक और सामाजिक संतुलन बनाए रखने की है। एक ओर झारखंड मुक्ति मोर्चा का आदिवासी-मूलवासी एजेंडा है, तो दूसरी ओर कांग्रेस और राजद सीमावर्ती जिलों की भाषाई वास्तविकता का हवाला देकर भोजपुरी, मगही और अंगिका को शामिल करने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।
रोजगार, पहचान और राजनीति का मुद्दा बना विवाद
भाषा विवाद अब केवल शिक्षा या परीक्षा का मामला नहीं रह गया है। यह मुद्दा रोजगार, क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक संतुलन से भी जुड़ चुका है। ऐसे में अब सबकी नजर मुख्यमंत्री सचिवालय पर टिकी है कि सरकार ऐसा कौन सा रास्ता निकालती है जिससे सभी पक्षों को संतुष्ट किया जा सके।


