MMDR विवाद: 1 सितंबर से झारखंड में कोयला डिस्पैच पर संकट? BCCL-CCL-ECL पर बढ़ा दबाव

MMDR की नई व्यवस्था के बाद रॉयल्टी चालान को लेकर विवाद बढ़ा। BCCL की अग्रिम राशि 30 अगस्त तक खत्म होने की आशंका, 1 सितंबर से झारखंड में कोयला डिस्पैच प्रभावित होने का खतरा।

MMDR की नई व्यवस्था से कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनियों पर दबाव, 1 सितंबर से झारखंड में कोयला डिस्पैच प्रभावित होने का खतरा

Hazaribagh: खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम के लागू होने के बाद खनिज राजस्व और रॉयल्टी चालान को लेकर केंद्र और झारखंड सरकार के बीच विवाद का असर अब कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनियों के परिचालन पर पड़ने की आशंका है। झारखंड में रॉयल्टी चालान जारी करने की प्रक्रिया में कथित गतिरोध के कारण BCCL, CCL और ECL के कोयला डिस्पैच पर दबाव बढ़ सकता है।

स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो 1 सितंबर 2026 से झारखंड में कोयला डिस्पैच प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

30 अगस्त तक खत्म हो सकती है BCCL की अग्रिम रॉयल्टी राशि

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) के पास रॉयल्टी मद में करीब 36 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि जमा है। कंपनी के खाते से रोजाना लगभग 4.5 करोड़ रुपये की कटौती हो रही है।

इस हिसाब से मौजूदा राशि के 30 अगस्त तक समाप्त होने की आशंका है। यदि इसके बाद नई व्यवस्था के तहत वैध रॉयल्टी चालान जारी नहीं हुआ, तो 1 सितंबर से कोयला डिस्पैच में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

वैध चालान के अभाव में कोयले की निकासी और आगे की आपूर्ति प्रक्रिया प्रभावित होने की स्थिति बन सकती है।

BCCL के साथ CCL और ECL पर भी असर की आशंका

यह मामला सिर्फ BCCL तक सीमित नहीं है। झारखंड में परिचालन करने वाली सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) और ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) भी रॉयल्टी और चालान व्यवस्था से जुड़ी हैं।

यदि विवाद का समाधान समय पर नहीं होता है, तो इन कंपनियों की कोयला आपूर्ति श्रृंखला पर भी दबाव बढ़ सकता है।

कोयला मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 तक झारखंड से कोल इंडिया की ओर से करीब 2,541.14 करोड़ रुपये रॉयल्टी के रूप में जमा किए गए थे। इसी अवधि में DMF के लिए 763.75 करोड़ रुपये और NMET के लिए 62.34 करोड़ रुपये का भुगतान दर्ज किया गया।

तीनों कंपनियों ने दी है बड़ी रॉयल्टी

कोयला निर्देशिका 2024-25 के अनुसार:

इन आंकड़ों से साफ है कि रॉयल्टी व्यवस्था में लंबे समय तक गतिरोध रहने पर इसका असर कंपनियों के परिचालन के साथ-साथ राज्य के खनिज राजस्व और कोयला उपभोक्ताओं की आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

क्या है MMDR विवाद की पृष्ठभूमि?

MMDR संशोधन को लेकर विवाद मुख्य रूप से राज्यों के खनिज अधिकारों और खनिज संसाधनों पर कर या उपकर लगाने की शक्ति से जुड़ा है।

साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने रॉयल्टी को टैक्स नहीं माना था और राज्यों के खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति को मान्यता दी थी। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र की नई व्यवस्था को लेकर खनिज संपदा वाले राज्यों की ओर से आपत्तियां सामने आई हैं।

झारखंड में इस विवाद का सीधा संबंध कोयला कंपनियों की रॉयल्टी और चालान व्यवस्था से जुड़ता दिखाई दे रहा है।

दूसरे राज्यों में भी असर की संभावना

कोल इंडिया की अन्य अनुषंगी कंपनियां जैसे SECL, MCL, NCL और WCL भी अलग-अलग राज्यों में खनन गतिविधियां संचालित करती हैं। यदि विभिन्न राज्यों में खनिज राजस्व नीतियों को लेकर इसी तरह का विवाद सामने आता है, तो भविष्य में इन कंपनियों के परिचालन पर भी असर पड़ सकता है।

हालांकि, फिलहाल इन कंपनियों के कोयला डिस्पैच पर तत्काल प्रभाव पड़ने की बात कहना जल्दबाजी होगी।

बिजली और उद्योगों की सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है असर

झारखंड से निकलने वाला कोयला केवल खनन कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। इसकी आपूर्ति बिजली संयंत्रों, स्टील, सीमेंट और अन्य औद्योगिक इकाइयों को भी की जाती है।

अगर डिस्पैच में लंबे समय तक बाधा आती है तो कोयला स्टॉक, रेलवे रैक और परिवहन व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है। इसका असर आगे चलकर औद्योगिक इकाइयों की आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ने की संभावना है।

30 अगस्त की डेडलाइन पर टिकी निगाहें

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तारीख 30 अगस्त 2026 मानी जा रही है। BCCL की अग्रिम रॉयल्टी राशि समाप्त होने की स्थिति में यदि नई व्यवस्था के तहत चालान जारी नहीं हो पाया, तो 1 सितंबर से कोयला डिस्पैच प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है।

अब नजर इस बात पर है कि केंद्र और राज्य के बीच रॉयल्टी एवं चालान व्यवस्था को लेकर चल रहे गतिरोध का समाधान समय रहते निकलता है या नहीं।

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