झारखंड के पारंपरिक वाद्य ‘मांदर’ को मिला GI Tag, लोक संस्कृति और कारीगरों को मिली नई पहचान

झारखंड के मांदर को मिला GI टैग, जानिए इसकी खासियत और इतिहास

झारखंड के पारंपरिक वाद्य ‘मांदर’ को मिला GI टैग, लोक संस्कृति को मिली नई पहचान

Ranchi: झारखंड की लोक संस्कृति और आदिवासी परंपरा से गहराई से जुड़े पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘मांदर’ को प्रतिष्ठित Geographical Indication (GI) Tag मिल गया है। मांदर को मिली यह मान्यता झारखंड की समृद्ध लोक परंपरा और पीढ़ियों से इस वाद्य को बनाने वाले पारंपरिक कारीगरों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

मांदर झारखंड के पर्व-त्योहारों, लोक नृत्य, शादी-ब्याह और सामाजिक आयोजनों का अभिन्न हिस्सा रहा है। इसकी खास थाप झारखंड की आदिवासी और लोक संस्कृति की पहचान से जुड़ी हुई है।

सदियों पुरानी परंपरा को मिली आधिकारिक पहचान

मांदर की विशेष बनावट, इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाली स्थानीय मिट्टी और इसकी विशिष्ट ध्वनि इसे दूसरे पारंपरिक वाद्य यंत्रों से अलग पहचान देती है। GI टैग मिलने के बाद मांदर की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान को आधिकारिक मान्यता मिली है।

यह उपलब्धि झारखंड की लोक संस्कृति के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे मांदर की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होने के साथ-साथ इसके पारंपरिक निर्माण से जुड़े कारीगरों को भी नई संभावनाएं मिलने की उम्मीद है।

2021 में शुरू हुई थी GI टैग की प्रक्रिया

मांदर के लिए GI टैग हासिल करने की प्रक्रिया वर्ष 2021 में शुरू हुई थी। इस प्रक्रिया में बौद्धिक संपदा विशेषज्ञ और राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय (NUSRL), रांची से जुड़े डॉ. सत्यदीप सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है।

बताया गया है कि जनवरी 2025 में दिल्ली में हुई अंतिम सुनवाई के दौरान भी इस मामले की पैरवी की गई थी।

ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी मांदर का उल्लेख

मांदर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को प्रमाणित करने के लिए कई पुराने दस्तावेजों और पुस्तकों का सहारा लिया गया। वर्ष 1915 में मानवशास्त्री शरत चंद्र राय की कृति, वर्ष 1931 में तारकचंद्र दास की पुस्तक और वर्ष 1940 में डब्ल्यू. जी. आर्चर की पुस्तक The Blue Grove में मांदर का उल्लेख होने की जानकारी दी गई है।

इसके अलावा वर्ष 1920 की पटना संग्रहालय की वार्षिक रिपोर्ट, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की 1956 की Folk Dances in India और रांची से संबंधित बिहार जिला गजेटियर में भी मांदर और इसके सांस्कृतिक उपयोग से जुड़े संदर्भ बताए गए हैं।

कारीगरों को मिल सकता है फायदा

GI टैग केवल किसी उत्पाद की पहचान को प्रमाणित करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि संबंधित क्षेत्र और पारंपरिक उत्पाद की विशिष्टता को भी पहचान देता है। ऐसे में मांदर को GI टैग मिलने से इसके पारंपरिक निर्माताओं और कारीगरों को अपने हुनर की बेहतर पहचान मिलने की उम्मीद है।

मांदर निर्माण से जुड़े स्थानीय कारीगरों के लिए यह उपलब्धि आर्थिक अवसरों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके जरिए झारखंड के इस पारंपरिक वाद्य को देश के अन्य हिस्सों और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को मिला सम्मान

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