झारखंड में बारिश का कोटा धीरे-धीरे हो रहा पूरा, अब सामान्य से 18% कम वर्षा; गढ़वा-पाकुड़ सबसे पीछे
Ranchi: झारखंड में मानसून की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल रहा है। राज्य में बारिश की कमी अब 21% से घटकर 18% रह गई है। मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 1 जून से 13 अगस्त 2026 तक झारखंड में 535.7 मिलीमीटर वास्तविक बारिश दर्ज की गई है, जबकि इस अवधि में सामान्य वर्षापात 650.2 मिलीमीटर होना चाहिए था।
हालांकि, राज्य के कई जिलों में अब भी बारिश की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। वहीं कुछ जिलों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई है, जिससे राज्य के औसत आंकड़े में सुधार हुआ है।
गढ़वा में सामान्य से 55% कम बारिश
राज्य के उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी हिस्सों के कई जिले बारिश की कमी से जूझ रहे हैं। इनमें गढ़वा की स्थिति सबसे खराब है। यहां सामान्य से 55% कम बारिश दर्ज की गई है।
इसके बाद पाकुड़ में 54% और चतरा में 52% कम बारिश हुई है। वहीं देवघर में सामान्य से 49%, कोडरमा में 47% और गिरिडीह में 42% कम बारिश रिकॉर्ड की गई है।
इन जिलों में बारिश की कमी का असर खेती और ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपलब्धता पर पड़ सकता है।
पश्चिमी सिंहभूम में सामान्य से 32% ज्यादा बारिश
दूसरी ओर, झारखंड के कुछ जिलों में मानसून ने अच्छी बारिश की है। पश्चिमी सिंहभूम में सामान्य से 32% अधिक वर्षा दर्ज की गई है। जिले में सामान्य 643.6 मिलीमीटर के मुकाबले 851 मिलीमीटर बारिश हो चुकी है।
सरायकेला-खरसावां में भी सामान्य से 6% अधिक बारिश दर्ज की गई है। वहीं खूंटी में 701.2 मिलीमीटर बारिश हुई है, जो सामान्य के करीब है।
रांची में सामान्य से सिर्फ 2% कम बारिश
राजधानी रांची में भी बारिश की स्थिति राज्य के कई अन्य जिलों की तुलना में बेहतर है। यहां सामान्य से 2% कम बारिश दर्ज की गई है।
वहीं सिमडेगा में सामान्य से 1% और पूर्वी सिंहभूम में 6% कम बारिश हुई है।
मानसून की कमी में लगातार सुधार
राज्य के औसत बारिश के आंकड़े को देखें तो मानसून की कमी में लगातार सुधार हुआ है। बारिश की कमी पहले 21% थी, जो अब घटकर 18% रह गई है।
हालांकि, राज्य के अलग-अलग जिलों में बारिश का वितरण असमान बना हुआ है। कुछ जिलों में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है, जबकि पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिलों में सामान्य से अधिक वर्षा रिकॉर्ड की गई है। मानसून के आगे के दिनों में बारिश की स्थिति राज्य के कुल वर्षापात और कृषि गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण रहेगी।
