बंधु तिर्की का बड़ा बयान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में स्थानीय भाषाओं को मिले प्राथमिकता

झारखंड की पहचान उसकी जनजातीय भाषाएं” : बंधु तिर्की का बड़ा बयान

कांग्रेस नेता बंधु तिर्की का बड़ा बयान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में स्थानीय भाषाओं को मिले प्राथमिकता

Gumla: Bandhu Tirkey ने झारखंड में चल रहे भाषाई विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए प्रतियोगिता परीक्षाओं में भोजपुरी और मगही को शामिल किए जाने का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान उसकी जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं से है, इसलिए सरकारी नियुक्तियों और प्रतियोगी परीक्षाओं में इन्हीं भाषाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

“स्थानीय भाषाएं झारखंड की सांस्कृतिक पहचान”

बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड संथाली, मुंडारी, हो, खड़िया, कुरुख, नागपुरी, खोरठा, कुरमाली और पंचपरगनिया जैसी भाषाओं की समृद्ध विरासत वाला राज्य है। ये भाषाएं यहां की संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान का अहम हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि सरकारी तंत्र अगर इन भाषाओं की उपेक्षा करेगा तो कई जनजातीय भाषाएं धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाएंगी।

प्रशासन और योजनाओं में स्थानीय भाषा जरूरी

कांग्रेस नेता ने कहा कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले अधिकारियों को स्थानीय भाषा का ज्ञान होना चाहिए। इससे योजनाओं का सही क्रियान्वयन, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने में आसानी होती है।

उन्होंने कहा कि मातृभाषा में संवाद होने से लोगों का भरोसा बढ़ता है और शिकायतों का समाधान भी तेजी से होता है।

“स्थानीय युवाओं को मिले रोजगार में अवसर”

बंधु तिर्की ने इसे सामाजिक न्याय से जुड़ा मुद्दा बताते हुए कहा कि स्थानीय भाषाओं को प्रतियोगिता परीक्षाओं में महत्व देने से झारखंड के युवाओं को रोजगार में समान अवसर मिलेगा और पलायन भी कम होगा।

उन्होंने दक्षिण भारत के राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां क्षेत्रीय भाषाओं को प्रशासन में प्राथमिकता देकर बेहतर परिणाम हासिल किए गए हैं।

भोजपुरी-मगही पर जताया विरोध

Bandhu Tirkey ने भोजपुरी और मगही को लेकर कहा कि ये पूर्ण विकसित भाषाएं नहीं बल्कि बोलचाल की शैली हैं। उन्होंने दावा किया कि बिहार में भी इन्हें अपेक्षित मान्यता नहीं मिली है, इसलिए झारखंड की प्रतियोगी परीक्षाओं में इन्हें शामिल करने की मांग उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री Hemant Soren झारखंड की संस्कृति और भाषाई पहचान को समझते हैं और उम्मीद है कि सरकार राज्यहित में फैसला लेगी।

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