Bihar: बिहार की नीतीश सरकार द्वारा मंत्रियों और वरिष्ठ विधायकों को दो-दो सरकारी आवास आवंटित करने के फैसले ने राज्य में नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। जहां विपक्ष इसे “अनैतिक और जनता के पैसे की बर्बादी” बता रहा है, वहीं सरकार ने इसे बंगलों के रखरखाव से जुड़ा फैसला बताया है।
विजय चौधरी की सफाई: बंगलों के संरक्षण का तर्क
भवन निर्माण मंत्री विजय कुमार चौधरी ने सरकार के इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि सरकारी बंगलों का इस्तेमाल न होने पर वे खराब हो जाते हैं। उन्होंने तर्क दिया:
जर्जर होने का डर: “यदि सरकारी आवास लंबे समय तक खाली पड़े रहेंगे, तो वे जर्जर होकर नष्ट हो जाएंगे। इसलिए मंत्रियों और वरिष्ठ सदस्यों को इनका आवंटन किया गया है।”
सुविधा और रखरखाव: मंत्रियों को उनके निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े कामकाज के लिए अतिरिक्त आवास की सुविधा दी जा रही है ताकि भवनों का उचित रखरखाव भी हो सके।
क्या है नया नियम और शर्तें?
नीतीश कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब मंत्रियों के साथ-साथ वरिष्ठ विधायकों को भी दो आवास मिल सकेंगे। इसके लिए कुछ शर्तें तय की गई हैं:
1. वरिष्ठता का पैमाना: जो सदस्य 6 या उससे अधिक बार विधानमंडल के सदस्य रहे हों, वे इसके पात्र होंगे।
2. अनुभव: सदस्य कम से कम एक बार मंत्री रहे हों या पूर्व में मुख्यमंत्री/उपमुख्यमंत्री रह चुके हों।
3. निर्धारित किराया: अतिरिक्त आवास मुफ्त नहीं होगा। मंत्रियों को अपने विधायक आवास के लिए **1700 रुपये प्रतिमाह** का निर्धारित किराया चुकाना होगा।
विपक्ष के सवाल: ‘जनता के साथ अन्याय’
विपक्ष (RJD) ने इस फैसले पर कड़ा ऐतराज जताया है। राजद नेताओं का कहना है कि एक तरफ आम आदमी को प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है, वहीं मंत्रियों को दो-दो आलीशान बंगले देना संसाधनों का दुरुपयोग है। वरिष्ठ पत्रकारों का यह भी मानना है कि यह कदम गठबंधन के भीतर असंतोष को कम करने और वरिष्ठ नेताओं को साधने की एक कोशिश हो सकती है।
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