झारखंड के किसानों को मिलेगी राहत? धान के बाद खाली खेतों में दूसरी फसल उगाने की योजना
झारखंड में धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले करीब 10 लाख हेक्टेयर खेतों में रबी और विविधीकृत खेती को बढ़ावा देने की तैयारी है। BAU की रबी अनुसंधान परिषद की बैठक में कार्ययोजना पर चर्चा हुई।

धान कटने के बाद खाली नहीं रहेंगे 10 लाख हेक्टेयर खेत! झारखंड में रबी फसलों की खेती को मिलेगा बढ़ावा
रांची: झारखंड में धान की कटाई के बाद खाली रह जाने वाले करीब 10 लाख हेक्टेयर खेतों को खेती के दायरे में लाने की तैयारी है। इन खेतों में रबी फसलों और विविधीकृत खेती को चरणबद्ध तरीके से बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को एक ही फसल पर निर्भरता से बाहर निकालना और उनकी आमदनी बढ़ाना है।
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (BAU) में मंगलवार को आयोजित 46वीं रबी अनुसंधान परिषद की बैठक में इस दिशा में प्रभावी कार्ययोजना तैयार करने पर चर्चा हुई। बैठक में कृषि वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने राज्य की कृषि परिस्थितियों के अनुरूप खेती की तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने पर जोर दिया।
कम लागत वाली तकनीक विकसित करने पर जोर
बैठक में कृषि सचिव अबूबकर सिद्दीकी पी ने कृषि वैज्ञानिकों से ऐसी तकनीक विकसित करने को कहा, जिन्हें किसान आसानी से अपना सकें। उन्होंने कम लागत, स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल और किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखकर अनुसंधान करने पर बल दिया।
कृषि सचिव ने कहा कि कृषि शोध की सार्थकता तभी है, जब उसका सीधा लाभ खेतों में काम करने वाले किसानों तक पहुंचे और उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति में सुधार हो। शोध का उद्देश्य केवल शोध पत्र प्रकाशित करना या प्रयोगशालाओं तक सीमित रहना नहीं होना चाहिए।
धान के बाद भी खेतों का होगा इस्तेमाल
कृषि सचिव ने कहा कि राज्य में धान की खेती के बाद बड़े क्षेत्र में खेत खाली रह जाते हैं। इन खेतों में दूसरी फसलों की खेती की संभावनाओं को तलाशने और किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है।
इसके लिए ऐसी कार्ययोजना बनाने पर जोर दिया गया, जिसे राज्य की अलग-अलग कृषि परिस्थितियों के अनुसार लागू किया जा सके। कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) को भी अपनी भूमिका मजबूत करने का निर्देश दिया गया।
बैठक में फसल सुधार, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, पौधों को बीमारियों और कीटों से बचाने, जल संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन के अनुकूल खेती की तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने पर चर्चा हुई। वैज्ञानिकों और किसानों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित कर शोध के परिणामों को खेतों तक पहुंचाना भी इस रणनीति का अहम हिस्सा होगा।
बारिश के बाद भी क्यों गहराता है जल संकट?
भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (IIAB), नामकुम के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित ने झारखंड में जल प्रबंधन की चुनौती की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि राज्य में पर्याप्त बारिश होने के बावजूद अक्टूबर के बाद कई इलाकों में पानी की कमी होने लगती है। इसका असर रबी की खेती और फसलों की उत्पादकता पर पड़ सकता है।
उन्होंने वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण और पानी के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने की जरूरत बताई। साथ ही खेती में पानी की खपत कम करने के लिए स्प्रिंकलर और ड्रिप जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया।
इन उपायों से उपलब्ध जल का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है और किसानों को सिंचाई संबंधी चुनौतियों से निपटने में मदद मिल सकती है।



