झारखंड के मर्मज्ञ सितारे: वो सियासी धुरंधर, जिनकी खाली कुर्सियां आज भी इतिहास से सवाल पूछती हैं
Ranchi: झारखंड की मिट्टी में खनिज की चमक के साथ संघर्ष और पहचान की एक लंबी कहानी भी दबी है। अलग राज्य के आंदोलन से लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण तक कई ऐसे जननेताओं ने अपनी भूमिका निभाई, जिन्होंने राजनीति को सिर्फ सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा का जरिया माना।
राज्य गठन के बाद झारखंड ने कई ऐसे राजनीतिक चेहरों को खोया, जिनकी अपनी अलग पहचान, जनाधार और राजनीतिक शैली थी। इनमें से कुछ नेता आंदोलन की राजनीति से निकले, कुछ मजदूरों और वंचित वर्गों की आवाज बने और कुछ ने सदन से लेकर सड़क तक जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाया।
आज इन नेताओं में से कई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी यादें झारखंड की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन और झारखंड आंदोलन की विरासत
झारखंड अलग राज्य आंदोलन का जिक्र शिबू सोरेन के बिना पूरा नहीं हो सकता। झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख नेताओं में शामिल शिबू सोरेन ने लंबे समय तक आदिवासी अधिकारों और अलग राज्य की मांग को राजनीतिक आंदोलन का स्वर दिया।
उनकी राजनीति का केंद्र जल, जंगल और जमीन जैसे मुद्दे रहे। झारखंड के राजनीतिक इतिहास में उनका योगदान एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
उनकी राजनीतिक विरासत आज भी झारखंड की राजनीति और झामुमो के राजनीतिक विमर्श में दिखाई देती है।
वे मंत्री, जिनकी अपनी अलग पहचान बनी
झारखंड की राजनीति ने समय के साथ कई ऐसे मंत्रियों को भी खोया, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में अलग पहचान बनाई।
रमेश सिंह मुंडा को उनकी सादगी और जनता से जुड़ाव के लिए याद किया जाता है। वहीं हाजी हुसैन अंसारी ने लंबे राजनीतिक जीवन में अल्पसंख्यक और सामाजिक मुद्दों से जुड़े विषयों को प्रमुखता से उठाया।
जगरनाथ महतो झारखंड की राजनीति में अपने बेबाक अंदाज और जनसरोकारों के लिए चर्चित रहे। शिक्षा और कोरोना महामारी के दौर में उनके काम को लेकर भी उनकी राजनीतिक पहचान बनी।
इसी तरह रामदास सोरेन और हाल ही में दिवंगत सुदिव्य कुमार सोनू भी झारखंड सरकार और झामुमो की राजनीति में सक्रिय चेहरों के रूप में जाने गए।
इन नेताओं की राजनीतिक शैली अलग-अलग रही, लेकिन उनके सार्वजनिक जीवन में अपने क्षेत्रों और राज्य के मुद्दों को लेकर सक्रियता दिखाई देती रही।
सदन से सड़क तक गूंजती थीं जिनकी आवाजें
झारखंड की राजनीतिक यात्रा में कुछ ऐसे नेता भी रहे, जिनकी पहचान उनके भाषण और बेबाक राजनीतिक शैली से बनी।
चंद्रशेखर दूबे ‘ददई दुबे’ मजदूर राजनीति और श्रमिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों के लिए जाने जाते रहे। उनकी ओजस्वी वाणी ने लंबे समय तक झारखंड की राजनीतिक बहस को प्रभावित किया।
लालचंद महतो की राजनीति में ग्रामीण और जमीन से जुड़े मुद्दों की अपनी जगह रही। वहीं समरेश सिंह, जिन्हें समर्थक और लोग ‘बड़का भैया’ कहकर संबोधित करते थे, अपनी बेबाक शैली और जनसंपर्क के लिए चर्चित रहे।
राजेंद्र सिंह का नाम भी झारखंड की राजनीति में लंबे अनुभव और सौम्य राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ लिया जाता है।
मन्नान मल्लिक और माधव लाल सिंह जैसे नेताओं के निधन के साथ झारखंड की राजनीति ने अपने कई पुराने और अनुभवी चेहरों को खो दिया।
विधायक, जिनकी राजनीति गांव की चौखट से जुड़ी थी
झारखंड की राजनीतिक विरासत केवल मंत्रियों तक सीमित नहीं रही। विधानसभा में कई ऐसे विधायक भी रहे, जिनकी पहचान उनके क्षेत्र और जनता से गहरे जुड़ाव के कारण बनी।
टेकलाल महतो झारखंडी अस्मिता और क्षेत्रीय मुद्दों से जुड़े जुझारू नेताओं में गिने जाते रहे। उनका राजनीतिक जीवन झारखंड आंदोलन और क्षेत्रीय राजनीति के कई महत्वपूर्ण दौर से जुड़ा रहा।
बागुन सुंब्रुई का लंबा राजनीतिक जीवन और सादगी उन्हें झारखंड के पुराने राजनीतिक चेहरों में अलग स्थान देता है। वहीं थियोडर किड़ो, विदेश सिंह, सुशीला हांसदा, पुष्कर हेंब्रम और कामेश्वर नाथ दास जैसे नेताओं ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में राजनीतिक पहचान बनाई।
इन नेताओं की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय समस्याओं, ग्रामीण जनता और क्षेत्रीय मुद्दों से जुड़ा रहा।
क्या बदल गई है झारखंड की राजनीतिक भाषा?
इन नेताओं को याद करने का मतलब सिर्फ अतीत को दोहराना नहीं है। यह सवाल भी है कि झारखंड की राजनीति पिछले दो दशकों में किस तरह बदली है।
आज राजनीति में सोशल मीडिया, चुनावी रणनीति, गठबंधन और तेज राजनीतिक संवाद की भूमिका पहले से कहीं अधिक है। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी बना हुआ है कि क्या जनता और जनप्रतिनिधि के बीच वही सीधा संवाद कायम है, जो पुराने दौर के कई नेताओं की पहचान हुआ करता था।
पुराने नेताओं की राजनीति से सहमत या असहमत होना अलग बात है, लेकिन उनकी सार्वजनिक भूमिका और जनसंपर्क की शैली झारखंड के राजनीतिक इतिहास का हिस्सा है।
खाली कुर्सियां छोड़ गईं सवाल
इन नेताओं के जाने के बाद उनकी कुर्सियां भले ही दूसरे चेहरों से भर गई हों, लेकिन उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की जगह पूरी तरह भरना आसान नहीं रहा।
झारखंड की राजनीति आज नई पीढ़ी, नई चुनौतियों और नए राजनीतिक समीकरणों के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में इन नेताओं की विरासत को याद करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव और सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं है।
यह जनता के सवालों को सदन तक पहुंचाने, संघर्ष के समय लोगों के साथ खड़े रहने और अपने राजनीतिक जीवन की एक छाप छोड़ने का भी नाम है।
झारखंड के इन सियासी चेहरों की यादें शायद यही सवाल छोड़ती हैं—क्या आने वाली पीढ़ी की राजनीति भी उतनी ही गहरी जनभागीदारी और जमीन से जुड़ाव की विरासत तैयार कर पाएगी?
