SIR केस में ममता सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका; कहा- “वोटर लिस्ट शुद्धिकरण में बाधा बर्दाश्त नहीं”

नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) को देश की सर्वोच्च अदालत से तगड़ा झटका लगा है।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण के लिए जारी इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की बाधा डालने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “राज्यों को यह स्पष्ट होना चाहिए”

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने ममता बनर्जी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया:

नोटिस जलाने की घटना पर DGP को फटकार

सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग ने कोर्ट को बताया कि बंगाल में कुछ उपद्रवियों ने एसआईआर से जुड़े सरकारी नोटिस जला दिए हैं।

8,505 अधिकारियों की होगी तैनाती

कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा चुनाव आयोग को सौंपी गई ग्रुप-बी के 8,505 अधिकारियों की सूची का संज्ञान लिया।

  1. इन अधिकारियों को एसआईआर प्रक्रिया के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाएगा।

  2. इन अधिकारियों की नियुक्ति का तरीका और उनके कामकाज का निर्धारण पूरी तरह निर्वाचन आयोग करेगा।

टीएमसी की आशंका: “योग्य मतदाताओं के नाम न हटें”

ममता बनर्जी के वकील श्याम दीवान ने कोर्ट में दलील दी कि सरकार को डर है कि इस प्रक्रिया के नाम पर बड़ी संख्या में योग्य मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं। उन्होंने ‘माइक्रो ऑब्जर्वर्स’ की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए। हालांकि, कोर्ट ने आयोग की स्वायत्तता को सर्वोपरि रखते हुए प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने का आदेश दिया।


SIR विवाद: मुख्य बिंदु

पक्ष मुख्य तर्क/टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट एसआईआर में बाधा डालने की अनुमति किसी को नहीं। संविधान सर्वोपरि है।
ममता सरकार बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाने की आशंका, प्रक्रिया पर सवाल।
चुनाव आयोग उपद्रवियों द्वारा नोटिस जलाए गए, राज्य पुलिस ने कार्रवाई नहीं की।
केंद्र सरकार संघीय ढांचे और संवैधानिक व्यवस्था का पालन अनिवार्य।

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