वेतन संकट पर BJP का हमला: झारखंड सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप

11 दिन बाद भी नहीं मिला वेतन: प्रतुल शाह देव ने सरकार को घेरा

झारखंड में वेतन संकट पर सियासत तेज: BJP का हमला, सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप

रांची: झारखंड में सरकारी कर्मचारियों के वेतन में देरी को लेकर सियासत तेज हो गई है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता Pratul Shah Deo ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि प्रदेश की वित्तीय स्थिति पूरी तरह चरमरा गई है और इसका सीधा असर कर्मचारियों पर पड़ रहा है।

प्रदेश मुख्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में प्रतुल शाह देव ने कहा कि “यह पहली बार है जब महीने की 11 तारीख बीत जाने के बाद भी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है।” उन्होंने बताया कि राज्य में करीब 2.35 लाख नियमित कर्मचारी और अधिकारी हैं, जबकि 40-45 हजार संविदा और आउटसोर्स कर्मी भी भुगतान का इंतजार कर रहे हैं। यानी कुल मिलाकर लगभग 2.75 लाख लोग वेतन के बिना प्रभावित हैं।

💰 “लाखों परिवारों पर संकट”

प्रतुल शाह देव के मुताबिक इन कर्मचारियों पर करीब 15 लाख लोग आश्रित हैं। वेतन नहीं मिलने से कई परिवारों की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई है—

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या झारखंड सरकार भी Himachal Pradesh की तरह कर्ज लेकर वेतन देने की स्थिति में पहुंच गई है?

📉 वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप

भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि आमतौर पर हर साल 5 अप्रैल तक वेतन भुगतान हो जाता था, लेकिन इस बार सरकार की वित्तीय बदइंतजामी के कारण देरी हो रही है।

उन्होंने दावा किया कि 31 मार्च तक सरकार 22,000 करोड़ रुपये खर्च नहीं कर पाई, क्योंकि खजाने में पैसा ही नहीं था। राजस्व वसूली भी लक्ष्य के मुताबिक नहीं हो सकी।

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने 31 मार्च को ही राज्य को हजारों करोड़ रुपये ट्रांसफर किए, इसके बावजूद स्थिति नहीं सुधरी।

🏛️ “शीश महल बनाम वेतन”

प्रतुल शाह देव ने Hemant Soren सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि एक तरफ कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल रहा, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री आवास के निर्माण के लिए करीब 100 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार “शीश महल” बनाने में व्यस्त है, जबकि लाखों कर्मचारी आर्थिक संकट झेल रहे हैं।


📌 निष्कर्ष

झारखंड में वेतन भुगतान में देरी अब सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। भाजपा ने इसे सरकार की नाकामी बताया है, जबकि अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार इस संकट से कैसे निपटती है और कर्मचारियों को राहत कब मिलती है

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