झारखंड में सूचना आयोग नियुक्ति पर सियासी घमासान: राजभवन की ‘लाल झंडी’ से बढ़ा विवाद, अब नजर हाईकोर्ट पर
Ranchi: झारखंड राज्य सूचना आयोग एक बार फिर विवादों में घिर गया है। लंबे समय से खाली पदों के कारण पहले ही दबाव झेल रहे इस आयोग में अब नियुक्तियों को लेकर नई बहस छिड़ गई है। राज्यपाल द्वारा सूचना आयुक्तों के चयन की फाइल लौटाए जाने के बाद सरकार की मंशा और पूरी चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
इस पूरे विवाद की शुरुआत आरटीआई कार्यकर्ता सुनील कुमार महतो की शिकायत से हुई, जिसमें उन्होंने चयन प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप और नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया। मामला सामने आते ही राजभवन ने सख्त रुख अपनाते हुए फाइल वापस कर दी।
🔎 विवाद की जड़ क्या है?
चयन समिति द्वारा जिन नामों की सिफारिश की गई, उनमें अलग-अलग दलों से जुड़े चेहरे शामिल हैं—
- भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक
- कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अमूल्य नीरज खालखो
- झामुमो नेता तुनज खत्री
यही नाम अब पूरे विवाद का केंद्र बन गए हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या राजनीतिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों को सूचना आयुक्त जैसे निष्पक्ष पद पर नियुक्त किया जा सकता है?
⚖️ कानून क्या कहता है?
Right to Information Act 2005 के तहत सूचना आयुक्त का पद पूरी तरह निष्पक्ष होना चाहिए।
कानून साफ कहता है कि—
- किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा व्यक्ति इस पद के लिए योग्य नहीं है
- लाभ के पद पर बैठे व्यक्ति की नियुक्ति भी वर्जित है
ऐसे में इन नामों की सिफारिश को सीधे तौर पर नियमों के खिलाफ माना जा रहा है।
🏛️ राजभवन ने क्यों लौटाई फाइल?
राज्यपाल ने फाइल लौटाते हुए स्पष्ट संकेत दिया है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और वैधानिक मानकों का पालन नहीं किया गया। इसे “लाल झंडी” के तौर पर देखा जा रहा है, जो सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
⚖️ अब मामला हाईकोर्ट में
यह विवाद अब Jharkhand High Court तक पहुंच चुका है।
नियुक्तियों में देरी और प्रक्रिया पर सवाल को लेकर पहले से ही याचिका लंबित है।
13 अप्रैल 2026 को इस मामले की सुनवाई होनी है, जहां अदालत यह तय कर सकती है कि—
- चयन प्रक्रिया सही थी या नहीं
- क्या नियमों का उल्लंघन हुआ है
🔮 आगे क्या हो सकता है?
1. नए चेहरों की तलाश
सरकार को विवादित नाम हटाकर ऐसे लोगों को चुनना पड़ सकता है, जिनका कोई राजनीतिक जुड़ाव न हो और जो कानून, समाज सेवा, विज्ञान या पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों से आते हों।
2. सरकार की सफाई
अगर सरकार इन्हीं नामों पर कायम रहती है, तो उसे राजभवन और अदालत के सामने ठोस कानूनी आधार देना होगा—जो फिलहाल आसान नहीं दिख रहा।
3. कोर्ट का कड़ा रुख
यदि सरकार संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती है, तो हाईकोर्ट पूरी चयन प्रक्रिया रद्द कर सकता है और नए सिरे से नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दे सकता है।
📌 निष्कर्ष
झारखंड में सूचना आयोग की नियुक्तियां अब केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहीं, बल्कि यह पारदर्शिता और कानून के पालन की बड़ी परीक्षा बन गई हैं।
अब सबकी नजर 13 अप्रैल की सुनवाई पर है—जहां यह तय होगा कि नियुक्तियों की यह “पटकथा” आगे बढ़ेगी या यहीं खत्म हो जाएगी।
