
महिला आरक्षण को लेकर प्रस्तावित संविधान संशोधन और इसके लिए बुलाए गए विशेष सत्र पर अब राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इस मुद्दे पर अपना स्पष्ट रुख सामने रखते हुए केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं।
पार्टी के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने प्रेस वार्ता में कहा कि केंद्र सरकार ने पहले जाति जनगणना कराने का आश्वासन दिया था, ऐसे में महिला आरक्षण विधेयक को लाने से पहले इस वादे को पूरा किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि बिना जातिगत आंकड़ों के इस तरह का बड़ा संवैधानिक बदलाव करना सामाजिक संतुलन के खिलाफ होगा।
“संवैधानिक चोले में राजनीतिक साजिश”
सुप्रियो भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि यह पूरा मामला एक “बड़ी राजनीतिक साजिश” है, जिसे संवैधानिक रूप देने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस विधेयक का असर खासकर झारखंड और दक्षिण भारत के छोटे राज्यों पर नकारात्मक पड़ सकता है।
छोटे राज्यों को नुकसान का दावा
झारखंड मुक्ति मोर्चा का मानना है कि इस प्रस्तावित संशोधन से जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व में बदलाव होगा, जिससे छोटे राज्यों की हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है। पार्टी ने इसे संघीय ढांचे के लिए भी चुनौती बताया है।
चंद्रबाबू नायडू से समर्थन वापस लेने की अपील
इस मुद्दे पर सुप्रियो भट्टाचार्य ने चंद्रबाबू नायडू का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों को संभावित नुकसान के बावजूद अगर केंद्र सरकार इस बिल को आगे बढ़ाती है, तो नायडू को सरकार से समर्थन वापस लेने पर विचार करना चाहिए।
JMM का साफ संदेश
झारखंड मुक्ति मोर्चा ने स्पष्ट किया है कि वह इस प्रस्तावित संशोधन का विरोध करेगा और इसे सामाजिक न्याय के खिलाफ मानता है। पार्टी का कहना है कि किसी भी बड़े संवैधानिक बदलाव से पहले व्यापक सामाजिक और सांख्यिकीय आधार तैयार किया जाना जरूरी है।
बढ़ेगा सियासी टकराव
महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अब राजनीतिक दलों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक गर्माने की संभावना है, खासकर तब जब केंद्र सरकार इस पर आगे बढ़ने की तैयारी में है।



