
हेमंत सोरेन का ‘सरना धर्म कोड’ पर बड़ा दांव, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को लिखा पत्र
झारखंड की राजनीति में एक बार फिर ‘सरना धर्म कोड’ का मुद्दा केंद्र में आ गया है। राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस बार सीधे देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपनी मांग को मजबूती से रखा है।
उन्होंने साफ कहा है कि आदिवासी समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में आगामी जनगणना में ‘सरना धर्म’ के लिए अलग कोड देने की मांग उठाई है। यह वही जनगणना है जो पहले 2021 में प्रस्तावित थी, लेकिन अब इसे आगे बढ़ाकर 2027 तक किए जाने की संभावना है।
सोरेन का कहना है कि देश के करोड़ों आदिवासी प्रकृति-आधारित ‘सरना’ परंपरा को मानते हैं, लेकिन जनगणना में अलग पहचान न होने के कारण उनकी असली संख्या और पहचान दर्ज नहीं हो पाती।
हेमंत सोरेन की मुख्य मांगें
- जनगणना 2027 में अलग कॉलम
‘सरना धर्म’ को एक स्वतंत्र कोड के रूप में शामिल किया जाए, ताकि आदिवासी समुदाय की सही गिनती हो सके। - विधानसभा के प्रस्ताव का हवाला
झारखंड विधानसभा पहले ही सर्वसम्मति से ‘सरना धर्म कोड’ के पक्ष में प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेज चुकी है। - आदिवासी अस्मिता का मुद्दा
सोरेन ने कहा कि सरना परंपरा केवल धर्म नहीं, बल्कि जीवनशैली और प्रकृति से जुड़ी पहचान है। - 21 राज्यों का डेटा
पिछली जनगणना में अलग कॉलम न होने के बावजूद करीब 50 लाख लोगों ने स्वयं ‘सरना’ धर्म दर्ज कराया था।
संवैधानिक आधार पर जोर
मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में संविधान की धारा-244 और पांचवीं अनुसूची का हवाला देते हुए कहा कि आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा केंद्र और राष्ट्रपति की विशेष जिम्मेदारी है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ‘सरना कोड’ सिर्फ सांस्कृतिक मांग नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है।
डिजिटल जनगणना का तर्क
सोरेन ने यह भी स्पष्ट किया कि आज के डिजिटल युग में जनगणना पूरी तरह तकनीकी रूप से संचालित हो रही है। ऐसे में ‘सरना’ के लिए अलग कोड जोड़ना न तो जटिल है और न ही असंभव।
उनका मानना है कि इससे सरकार को आदिवासी समुदाय के लिए बेहतर योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी।
राजनीतिक और सामाजिक असर
‘सरना धर्म कोड’ की मांग लंबे समय से झारखंड और अन्य आदिवासी बहुल राज्यों में उठती रही है।
हेमंत सोरेन का यह कदम इस मुद्दे को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला सकता है।
यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है और क्या आगामी जनगणना में आदिवासी समुदाय को अलग धार्मिक पहचान मिल पाती है या नहीं।


