असम के डिब्रूगढ़ जिले में चुनावी सरगर्मी के बीच झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren ने तिंगखोंग और सोनारी विधानसभा क्षेत्रों में जोरदार जनसभाएं कर माहौल गरमा दिया। उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के प्रत्याशियों महावीर बासके और बलदेव तेली के पक्ष में जनता से समर्थन मांगा और अपने भाषण में खासतौर पर चाय बागान श्रमिकों और आदिवासी समुदाय के मुद्दों को केंद्र में रखा।
चाय बागान श्रमिकों की बदहाली पर उठाए सवाल: Hemant Soren
हेमंत सोरेन ने कहा कि असम का चाय बागान समुदाय पिछले लगभग 200 वर्षों से राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है, लेकिन आज भी यह समुदाय अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित है। उन्होंने मजदूरी का मुद्दा उठाते हुए बताया कि जहां असम में श्रमिकों को करीब 250 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, वहीं कर्नाटक जैसे राज्यों में यह आंकड़ा लगभग 600 रुपये तक है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इतने लंबे समय से इस समुदाय का सिर्फ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया गया है, लेकिन उनके जीवन स्तर में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ। भूमि अधिकार, सम्मानजनक आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं आज भी इन तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाई हैं।
“अब बदलाव का समय”- आदिवासी एकजुटता का आह्वान: Hemant Soren
अपने संबोधन में सोरेन ने आदिवासी समाज की ताकत पर जोर देते हुए कहा कि अब समय बदलाव का है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय को एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह झारखंड राज्य आदिवासियों के संघर्ष से बना, उसी तरह असम में भी अधिकारों के लिए संगठित लड़ाई जरूरी है।
भाजपा पर साधा निशाना: Hemant Soren
सोरेन ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि आदिवासी समाज का बार-बार केवल राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग किया जाता है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन बाद में उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज कमजोर नहीं है, बल्कि वह सत्ता बनाना भी जानता है और जरूरत पड़ने पर सत्ता बदलना भी।
विकास का नया मॉडल पेश करने का दावा
सोनारी में जनसभा को संबोधित करते हुए सोरेन ने कहा कि विकास का मतलब केवल आंकड़े नहीं, बल्कि हर घर तक पहुंचने वाली खुशहाली है। उन्होंने युवाओं को रोजगार, मेहनतकशों को सम्मान और आदिवासी-स्थानीय समाज को उनका हक दिलाने का वादा किया। उन्होंने कहा कि असम की जनता अब ऐसा बदलाव चाहती है जो सिर्फ वादों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन पर नजर आए।
भारी संख्या में जुटी भीड़
इन जनसभाओं में हजारों की संख्या में चाय बागान श्रमिक, आदिवासी समुदाय के लोग और स्थानीय नागरिक शामिल हुए। कार्यक्रम में झारखंड सरकार के कई मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता भी मौजूद रहे। हेमंत सोरेन की यह चुनावी सभाएं सिर्फ राजनीतिक समर्थन जुटाने तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने असम के चाय बागान श्रमिकों और आदिवासी समुदाय के लंबे समय से लंबित मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर चुनावी बहस को नई दिशा देने की कोशिश की है।
