
निर्मल महतो हत्याकांड: हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, 29 साल से जेल में बंद नरेंद्र सिंह की समयपूर्व रिहाई पर फिर होगा विचार
रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद निर्मल महतो हत्याकांड के दोषी नरेंद्र सिंह उर्फ नरेंद्र पंडित की समयपूर्व रिहाई को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (State Sentence Review Board) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें नरेंद्र सिंह की समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने बोर्ड को निर्देश दिया है कि वह राज्य सरकार की वर्ष 2011 की रिहाई नीति के तहत तीन महीने के भीतर मामले पर नए सिरे से विचार कर निर्णय ले।
हाईकोर्ट ने बोर्ड के फैसले को किया रद्द
यह आदेश झारखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय की अदालत ने सुनाया। नरेंद्र सिंह ने 28 मार्च 2025 को राज्य सजा समीक्षा बोर्ड द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी समयपूर्व रिहाई की मांग अस्वीकार कर दी गई थी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि बोर्ड ने मामले में उपलब्ध कई महत्वपूर्ण तथ्यों और प्रोबेशन ऑफिसर की अनुकूल रिपोर्ट पर पर्याप्त विचार नहीं किया। अदालत ने कहा कि केवल अपराध के राजनीतिक पहलू को आधार बनाकर रिहाई से इनकार करना उचित नहीं माना जा सकता।
29 साल से जेल में बंद है नरेंद्र सिंह
निर्मल महतो हत्याकांड में दोषी ठहराए गए नरेंद्र सिंह हत्या और आर्म्स एक्ट के तहत उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। वह वास्तविक रूप से लगभग 23 वर्ष जेल में बिता चुके हैं, जबकि रिमिशन (छूट) सहित उनकी कुल सजा अवधि 29 वर्ष हो चुकी है।
वर्ष 2017 में झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी सजा को बरकरार रखा था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट भी दे चुका था निर्देश
जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने नरेंद्र सिंह की याचिका खारिज करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि उसकी समयपूर्व रिहाई पर राज्य की नीति के अनुसार विचार किया जाए। इसके बावजूद राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने यह कहते हुए उनकी अर्जी खारिज कर दी थी कि उन्होंने एक लोकप्रिय जनप्रतिनिधि की राजनीतिक कारणों से योजनाबद्ध हत्या की थी और उनकी रिहाई से समाज में गलत संदेश जाएगा।
हाईकोर्ट ने प्रक्रिया पर जताई आपत्ति
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 2011 की राज्य सरकार की नीति के अनुसार समयपूर्व रिहाई पर निर्णय लेते समय कई पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है। इनमें अपराध का सामाजिक प्रभाव, भविष्य में अपराध की संभावना, कैदी के आचरण, जेल में बिताई गई अवधि तथा सामाजिक परिस्थितियां शामिल हैं।
अदालत ने माना कि बोर्ड ने इन आवश्यक मानकों की समुचित समीक्षा किए बिना केवल अपराध की प्रकृति पर अधिक जोर दिया, जो नीति की भावना के अनुरूप नहीं है।
तीन महीने में लेना होगा नया फैसला
हाईकोर्ट ने राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के पुराने आदेश को निरस्त करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है। साथ ही निर्देश दिया है कि 2011 की समयपूर्व रिहाई नीति के सभी मानकों को ध्यान में रखते हुए तीन महीने के भीतर अंतिम निर्णय लिया जाए।
इस फैसले के बाद निर्मल महतो हत्याकांड एक बार फिर चर्चा में आ गया है और अब सभी की नजरें राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के आगामी निर्णय पर टिकी हैं।



