
बिहार मंत्रिमंडल में परिवारवाद की गूंज, विरोध करने वाले दलों पर ही उठे सवाल
बिहार की राजनीति में नए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद परिवारवाद को लेकर बहस तेज हो गई है। पटना के गांधी मैदान में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह की तस्वीरों ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में वंशवाद और राजनीतिक विरासत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और नीतीश कुमार सहित कई बड़े नेता मौजूद थे। इसी मंच से ऐसे कई नेताओं ने मंत्री पद की शपथ ली जिनकी पहचान उनके राजनीतिक परिवारों से जुड़ी रही है।
मंत्रिमंडल में कई राजनीतिक परिवारों के चेहरे
सबसे ज्यादा चर्चा निशांत कुमार की एंट्री को लेकर हो रही है। निशांत कुमार, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे हैं और लंबे समय तक परिवारवाद के खिलाफ राजनीति करने वाले जेडीयू नेतृत्व के लिए यह बड़ा राजनीतिक बदलाव माना जा रहा है।
इसके अलावा:
- दीपक प्रकाश को उपेंद्र कुशवाहा के बेटे के रूप में देखा जा रहा है
- संतोष कुमार सुमन, जीतन राम मांझी के बेटे हैं
- श्रेयसी सिंह पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह की बेटी हैं
- नीतीश मिश्रा पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा के बेटे हैं
- अशोक चौधरी महावीर चौधरी के बेटे हैं
- सुनील कुमार चंद्रिका राम के बेटे हैं
- रमा निषाद कैप्टन जयनारायण निषाद की बहू हैं
- विजय चौधरी जगदीश प्रसाद चौधरी के बेटे हैं
परिवारवाद पर बीजेपी और NDA पर सवाल
राजनीतिक गलियारों में अब सबसे ज्यादा सवाल भारतीय जनता पार्टी और एनडीए पर उठ रहे हैं। यही गठबंधन लंबे समय से परिवारवाद के खिलाफ अभियान चलाता रहा है।
बीजेपी ने पहले तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, एम.के. स्टालिन और हेमन्त सोरेन जैसे नेताओं को परिवारवाद की राजनीति का उदाहरण बताया था।
लेकिन अब बिहार मंत्रिमंडल में कई राजनीतिक परिवारों के सदस्यों को जगह मिलने के बाद विपक्ष NDA को घेरने में जुट गया है।
तेजस्वी यादव ने खोला मोर्चा
इस मुद्दे पर तेजस्वी यादव लगातार हमलावर नजर आ रहे हैं। आरजेडी का कहना है कि जिस परिवारवाद को लेकर वर्षों तक विपक्ष को घेरा गया, अब वही राजनीति NDA के भीतर दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की नई राजनीतिक तस्वीर ने यह बहस फिर तेज कर दी है कि क्या भारतीय राजनीति में आज भी राजनीतिक विरासत सबसे बड़ा रास्ता बनी हुई है।
फिलहाल बिहार मंत्रिमंडल के इस विस्तार ने यह साफ कर दिया है कि परिवारवाद पर राजनीति करने वाले दल भी अब उसी राजनीतिक मॉडल का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं, जिसका वे लंबे समय तक विरोध करते रहे।



