मां मौलिक्षा का दरबार, 108 मंदिरों वाली मलूटी को क्यों कहते हैं गुप्त काशी?

मां मौलिक्षा और तारापीठ की मां तारा का क्या है संबंध? जानिए मलूटी की लोकमान्यता

Maluti Temple: मां मौलिक्षा का दरबार और 108 मंदिरों वाली गुप्त काशी, जानिए मलूटी का इतिहास

Dumka News: झारखंड के दुमका जिले में स्थित मलूटी गांव अपनी धार्मिक आस्था, प्राचीन मंदिरों और अनूठी स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। यहां विराजमान मां मौलिक्षा के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिरों की ऐतिहासिक विरासत के कारण मलूटी को मंदिरों की नगरी और गुप्त काशी के नाम से भी जाना जाता है।

मलूटी की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं है, बल्कि यह झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां के मंदिर सदियों पुराने इतिहास, लोकपरंपराओं और स्थापत्य कला की कहानी कहते हैं।

108 मंदिरों के लिए प्रसिद्ध था मलूटी गांव

दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड के पास स्थित मलूटी गांव कभी 108 मंदिरों के लिए जाना जाता था। आज यहां करीब 72 मंदिर शेष बताए जाते हैं। इन मंदिरों में भगवान शिव, मां दुर्गा, मां काली, धर्मराज, मनसा और भगवान विष्णु सहित विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा से जुड़ी परंपराएं रही हैं।

इन प्राचीन मंदिरों के बीच मां मौलिक्षा का मंदिर विशेष धार्मिक महत्व रखता है। यहां मां को सिंहवाहिनी दुर्गा के स्वरूप में पूजा जाता है। श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है।

मां मौलिक्षा और तारापीठ की मां तारा का संबंध

स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार, मां मौलिक्षा को पश्चिम बंगाल के तारापीठ में विराजमान मां तारा की बड़ी बहन माना जाता है। यह भी मान्यता प्रचलित है कि महान साधक बामाखेपा तारापीठ जाने से पहले मां मौलिक्षा की आराधना करते थे।

हालांकि, ये मान्यताएं स्थानीय आस्था और लोकपरंपराओं का हिस्सा हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इन कथाओं ने मलूटी के धार्मिक महत्व को और खास बनाया है।

टेराकोटा कला और मंदिरों की अनूठी स्थापत्य शैली

मलूटी के मंदिर अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली और टेराकोटा की कलाकृतियों के लिए भी पहचाने जाते हैं। मंदिरों की दीवारों पर देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों, पौराणिक कथाओं और तत्कालीन सामाजिक जीवन से जुड़े दृश्य उकेरे गए हैं।

इन कलाकृतियों में बंगाल की स्थापत्य परंपरा की झलक दिखाई देती है। मंदिरों की बनावट और दीवारों पर बनी आकृतियां इस क्षेत्र की कला, धार्मिक जीवन और सांस्कृतिक इतिहास को समझने का अवसर देती हैं।

ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण की जरूरत

मलूटी के प्राचीन मंदिर केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर भी हैं। समय के साथ इन संरचनाओं को सुरक्षित रखना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। इनके संरक्षण के लिए मंदिरों की मूल बनावट, कलाकृतियों और ऐतिहासिक विशेषताओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

इसके साथ ही मां मौलिक्षा से जुड़ी लोककथाओं, पूजा-पद्धतियों और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को भी सहेजने की आवश्यकता है। इससे आने वाली पीढ़ियां इस विरासत के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व को बेहतर ढंग से समझ सकेंगी।

आस्था, इतिहास और संस्कृति का संगम है मलूटी

मां मौलिक्षा का मंदिर मलूटी की धार्मिक पहचान है, जबकि यहां के प्राचीन मंदिर झारखंड की ऐतिहासिक विरासत की झलक पेश करते हैं। टेराकोटा कला, लोकमान्

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