झारखंड RWD में ‘वायरल चिट्ठी’ का खेल: इंजीनियरों ने ही बताया फर्जी, सियासत तेज
झारखंड के ग्रामीण कार्य विभाग (RWD) में टेंडर विवाद अब एक नए और उलझे मोड़ पर पहुंच गया है। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर वायरल एक शिकायत पत्र ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी थी, लेकिन अब उसी पत्र को लेकर विभाग के इंजीनियरों ने बड़ा यू-टर्न ले लिया है। इस पूरे मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है।
क्या है वायरल चिट्ठी का मामला?
बताया जा रहा था कि 23 अप्रैल 2026 को विभाग के कई इंजीनियरों ने मुख्य अभियंता को एक संयुक्त शिकायत पत्र लिखा।
इस पत्र में आरोप लगाया गया कि रांची निवासी बब्लू मिश्रा टेंडर प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए इंजीनियरों पर दबाव बनाते हैं, अपशब्द कहते हैं और गाली-गलौज तक करते हैं।
चिट्ठी में कई इंजीनियरों के हस्ताक्षर भी बताए जा रहे थे, जिससे मामला और गंभीर हो गया।
मरांडी की एंट्री से गरमाई सियासत
इस वायरल पत्र के आधार पर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की।
- टेंडर सिंडिकेट पर रोक लगाने की बात कही गई
- पूरे मामले की गंभीर जांच की मांग उठाई गई
मरांडी के पत्र के बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया।
नया मोड़: इंजीनियरों ने ही बताया ‘फर्जी’
लेकिन कहानी यहीं पलट गई।
ग्रामीण कार्य विभाग के इंजीनियरों ने एक नया पत्र लिखकर साफ कहा कि—
- वायरल हो रही चिट्ठी उन्होंने लिखी ही नहीं
- उनके नाम और हस्ताक्षर का गलत इस्तेमाल किया गया
इस खुलासे ने पूरे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
चौंकाने वाली बात: किसी अधिकारी ने नहीं किया रिसीव
जांच में एक और अहम तथ्य सामने आया है—
- वायरल शिकायत पत्र को विभाग के किसी भी अधिकारी ने आधिकारिक रूप से रिसीव नहीं किया
- यानी यह पत्र विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं है
इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि आखिर यह चिट्ठी बनी कैसे और बाहर कैसे आई?
सबसे बड़ा सवाल: चिट्ठी पहुँची कैसे?
अब इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है—
- जब इंजीनियरों ने पत्र लिखा ही नहीं, तो वह सोशल मीडिया तक कैसे पहुंचा?
- और वही पत्र नेता प्रतिपक्ष तक कैसे पहुंच गया?
- क्या यह किसी साजिश का हिस्सा है या फिर किसी ने जानबूझकर माहौल बनाने की कोशिश की?
निष्कर्ष: जांच के बिना सच सामने आना मुश्किल
झारखंड RWD का यह मामला अब केवल टेंडर विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह फर्जी दस्तावेज, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का बड़ा मुद्दा बन चुका है।
जब तक इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक यह तय कर पाना मुश्किल होगा कि असली सच्चाई क्या है—
टेंडर सिंडिकेट का खेल या फिर एक सुनियोजित फर्जीवाड़ा।
