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क्या खत्म हो रहा है क्षेत्रीय दलों का दौर? भारतीय राजनीति में दिख रहा बड़ा बदलाव

राज्यों से दिल्ली तक कमजोर पड़ते क्षेत्रीय दल, क्या है इसके मायने?

क्षेत्रीय दलों का घटता प्रभाव और बदलती भारतीय राजनीति

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक लंबा दौर ऐसा रहा जब दिल्ली की सत्ता का रास्ता राज्यों की राजधानियों से होकर गुजरता था। 1989 से लेकर 2014 तक का दौर गठबंधन राजनीति का युग माना गया, जहां क्षेत्रीय दल और उनके नेता यह तय करने में बड़ी भूमिका निभाते थे कि देश का प्रधानमंत्री कौन होगा। लेकिन पिछले एक दशक और खासकर 2026 के चुनावी नतीजों ने इस राजनीति की दिशा बदलती हुई दिखाई है। जो क्षेत्रीय दल कभी अपने राज्यों में अजेय माने जाते थे, वे आज अपने अस्तित्व और प्रभाव को बचाने की चुनौती से जूझ रहे हैं।

हालिया चुनावी परिणामों पर नजर डालें तो यह बदलाव साफ दिखाई देता है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी की लंबे समय से चली आ रही सत्ता खत्म हो गई, वहीं तमिलनाडु में डीएमके की अप्रत्याशित हार ने भी राजनीतिक समीकरण बदल दिए। तमिलनाडु में नई पार्टी टीवीके की दमदार एंट्री ने यह संकेत दिया कि पारंपरिक क्षेत्रीय राजनीति का असर पहले जैसा नहीं रहा। तमिल पहचान और क्षेत्रीय गौरव के मुद्दों के बावजूद डीएमके सत्ता विरोधी लहर का सामना नहीं कर सकी। यहां तक कि मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को भी हार का सामना करना पड़ा। इससे यह स्पष्ट हुआ कि केवल क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर चुनाव जीतना अब आसान नहीं रह गया है।

उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी जैसी कभी मजबूत मानी जाने वाली पार्टी का एक-एक सीट के लिए संघर्ष करना और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल जैसी ताकतों का लगातार कमजोर पड़ना भी इसी बदलाव का हिस्सा माना जा रहा है। दक्षिण भारत में तेलंगाना में बीआरएस की हार और ओडिशा में नवीन पटनायक के लंबे शासन का अंत यह दिखाता है कि मतदाता अब केवल क्षेत्रीय पहचान के आधार पर वोट नहीं दे रहा।

महाराष्ट्र में भी राजनीति तेजी से बदली है। कभी शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के इर्द-गिर्द घूमने वाली राजनीति अब बड़े राष्ट्रीय गठबंधनों के भीतर अपनी जगह बचाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। कर्नाटक में जेडीएस का प्रभाव भी लगातार सीमित होता जा रहा है। वहीं आम आदमी पार्टी, जिसने कभी राष्ट्रीय विकल्प बनने का दावा किया था, उसका प्रभाव भी पहले की तुलना में कम होता दिख रहा है। दिल्ली और पंजाब तक सीमित होती पार्टी राज्यसभा में भी अपनी ताकत खो चुकी है।

हालांकि इस तस्वीर में कुछ अपवाद भी मौजूद हैं। झारखंड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा ने 2024 के विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया और अपनी मजबूत पकड़ साबित की। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी अपनी राजनीतिक ताकत बरकरार रखी है। यह दिखाता है कि जहां क्षेत्रीय दल स्थानीय मुद्दों और जनता से सीधा जुड़ाव बनाए रखने में सफल हैं, वहां उनकी जमीन अभी भी मजबूत है।

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका हमेशा संतुलन बनाने वाली रही है। अगर देश धीरे-धीरे दो बड़े राष्ट्रीय ध्रुवों की राजनीति की ओर बढ़ता है, तो इसके कई प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। मजबूत क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी में केंद्र सरकारों को गठबंधन की मजबूरियों के साथ काम करना पड़ता था, जिससे बड़े फैसलों पर व्यापक सहमति बनानी पड़ती थी। लेकिन क्षेत्रीय दलों के कमजोर होने से केंद्र सरकारें ज्यादा मजबूत और निर्णायक हो सकती हैं।

दूसरी तरफ क्षेत्रीय दलों की सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि वे स्थानीय समस्याओं और सांस्कृतिक मुद्दों को गहराई से समझते हैं। बिहार की बाढ़, तमिलनाडु की भाषा और संस्कृति या पूर्वोत्तर राज्यों की क्षेत्रीय चिंताएं — इन मुद्दों को क्षेत्रीय दल ज्यादा प्रभावी तरीके से उठाते रहे हैं। अगर इन दलों का प्रभाव कम होता है, तो आशंका यह भी है कि स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के बड़े एजेंडे के नीचे दब सकते हैं।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह बदलाव बड़ा माना जा रहा है। अब तक भारतीय राजनीति जाति, क्षेत्र और स्थानीय समीकरणों के आधार पर बंटी हुई दिखाई देती थी। लेकिन क्षेत्रीय दलों के कमजोर होने से मुकाबला धीरे-धीरे विचारधारा आधारित राजनीति की तरफ बढ़ सकता है। मतदाता स्थानीय चेहरों से ज्यादा राष्ट्रीय नेतृत्व और पार्टी की विचारधारा के आधार पर वोट दे सकता है।

इसके साथ ही संघीय ढांचे पर भी असर पड़ सकता है। क्षेत्रीय दल हमेशा राज्यों के अधिकारों और स्वायत्तता की आवाज उठाते रहे हैं। अगर उनकी ताकत कम होती है, तो केंद्र का प्रभाव बढ़ सकता है और राज्यों को यह चिंता हो सकती है कि उनकी पहचान और अधिकार कमजोर पड़ रहे हैं। इससे केंद्र और राज्यों के बीच टकराव की स्थिति भी पैदा हो सकती है।

आम जनता के लिए यह बदलाव सुविधा और पहचान के बीच संतुलन की लड़ाई जैसा होगा। एक तरफ मजबूत और स्थिर सरकारें बड़े फैसले लेने में सक्षम होंगी, वहीं दूसरी तरफ लोगों को यह डर भी रहेगा कि उनकी स्थानीय भाषा, संस्कृति और छोटी-छोटी समस्याओं को उतनी गहराई से नहीं समझा जाएगा, जितना एक क्षेत्रीय नेतृत्व समझता था। भारतीय राजनीति फिलहाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि देश की राजनीति पूरी तरह राष्ट्रीय दलों के इर्द-गिर्द सिमटेगी या क्षेत्रीय दल फिर से अपनी नई भूमिका गढ़ पाएंगे।

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