TMC में सियासी भूचाल: 15 साल की सत्ता के बाद सबसे बड़े संकट में ममता बनर्जी की पार्टी?
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों बड़ा उथल-पुथल देखने को मिल रहा है। कभी राज्य की सबसे ताकतवर राजनीतिक ताकत मानी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब अपने अस्तित्व से जुड़े सवालों का सामना करती नजर आ रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी और कथित गुटबाजी ने बंगाल की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।
कांग्रेस से अलग होकर बनी थी TMC
तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1998 में Mamata Banerjee ने कांग्रेस से अलग होकर की थी। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों ने पार्टी को जनाधार दिया और वर्ष 2011 में ममता बनर्जी ने 34 वर्षों से सत्ता में काबिज वाम मोर्चे को पराजित कर पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया अध्याय लिखा।
इसके बाद लगातार 15 वर्षों तक राज्य की राजनीति में ममता बनर्जी और TMC का दबदबा बना रहा।
पार्टी के भीतर बढ़ा असंतोष
हाल के दिनों में पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कई विधायक संगठन की कार्यशैली और कुछ नेताओं के प्रभाव को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं।
इसी बीच पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा नेतृत्व के खिलाफ सवाल उठाए जाने के बाद स्थिति और गंभीर हो गई।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार विवाद की शुरुआत फलता विधानसभा क्षेत्र के विधायक जहांगीर खान को लेकर उठे सवालों से हुई। पार्टी की बैठकों में कुछ विधायकों ने उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होने पर नाराजगी जताई।
इसके बाद विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने पार्टी के भीतर निर्णय प्रक्रिया और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए। मामला धीरे-धीरे संगठनात्मक असंतोष से नेतृत्व की कार्यशैली तक पहुंच गया।
हस्ताक्षर विवाद ने बढ़ाई मुश्किलें
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि विधानसभा से जुड़े कुछ दस्तावेजों में विधायकों के हस्ताक्षरों को लेकर पारदर्शिता नहीं बरती गई। इन आरोपों के बाद राजनीतिक विवाद और तेज हो गया।
हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस मुद्दे ने पार्टी के भीतर चल रहे मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया।
अभिषेक बनर्जी के दौरे के बाद बढ़ी अटकलें
30 मई को Abhishek Banerjee के सोनारपुर दौरे के दौरान हुए विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी। इसके बाद से लगातार यह अटकलें लगाई जाने लगीं कि पार्टी के भीतर बड़ा विभाजन हो सकता है।
कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि पार्टी के कई विधायक एक अलग समूह के साथ खड़े हो सकते हैं, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
क्या TMC में टूट संभव है?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी दल के भीतर बड़े पैमाने पर असंतोष लंबे समय तक बना रहता है तो उसका असर संगठन और चुनावी प्रदर्शन दोनों पर पड़ता है।
हालांकि TMC नेतृत्व लगातार यह दावा करता रहा है कि पार्टी एकजुट है और सभी विधायक ममता बनर्जी के नेतृत्व में काम कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल
अब पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी के भीतर उभर रहे असंतोष को नियंत्रित कर पाएंगी? क्या TMC फिर से खुद को संगठित कर मजबूत स्थिति में ला पाएगी, या फिर यह संकट आने वाले समय में और गहरा होगा?
फिलहाल बंगाल की राजनीति में निगाहें TMC के अगले कदम और पार्टी नेतृत्व की रणनीति पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि यह केवल असंतोष की आवाज है या फिर पश्चिम बंगाल की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत।
