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सारंडा में ‘अंतिम प्रहार’: 1 करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा 10 किमी के घेरे में फंसा

ऑपरेशन सारंडा: डेथ जोन में घिरा टॉप माओवादी नेता मिसिर बेसरा

ऑपरेशन ‘अंतिम प्रहार’: सारंडा के डेथ जोन में घिरा एक करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा, 10 किमी का चक्रव्यूह तैयार

चाईबासा: झारखंड के घने और दुर्गम सारंडा जंगल, जिन्हें कभी माओवादियों का अभेद्य गढ़ माना जाता था, अब उनके लिए ही जाल बनते जा रहे हैं। सुरक्षा बलों ने भाकपा (माओवादी) के शीर्ष नेता और एक करोड़ रुपये के इनामी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ सागर को पूरी तरह से घेर लिया है। खुफिया इनपुट के आधार पर चाईबासा के छोटानागरा थाना क्षेत्र में ऐसा चक्रव्यूह रचा गया है, जिसे तोड़ पाना बेहद मुश्किल माना जा रहा है।

बाबूडेरा बना आखिरी ठिकाना

सूत्रों के अनुसार, मिसिर बेसरा अपने 20-25 हथियारबंद साथियों के साथ बाबूडेरा और कुमडीह के घने जंगलों में फंसा हुआ है। सुरक्षा बलों ने करीब 10 किलोमीटर के दायरे में घेराबंदी कर दी है। पिछले 48 घंटों में यहां कई बार मुठभेड़ हुई है। 15 और 16 अप्रैल को हुई गोलीबारी में कुछ जवान घायल भी हुए, लेकिन ऑपरेशन की रफ्तार धीमी नहीं पड़ी है।

चारों तरफ से सील हुआ रास्ता

सुरक्षाबलों ने रणनीतिक तरीके से इलाके को पूरी तरह लॉक कर दिया है।

  • झारखंड जगुआर और CRPF की कोबरा बटालियन ने चाईबासा और सरायकेला की दिशा से मोर्चा संभाल रखा है।
  • ओडिशा पुलिस की मदद से कोइडा और बोलानी की ओर जाने वाले रास्ते बंद कर दिए गए हैं।
  • छत्तीसगढ़ की ओर जाने वाले रेड कॉरिडोर में भी निगरानी कड़ी कर दी गई है।

यानी मिसिर बेसरा के पास अब भागने का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं बचा है।

दस्ते में बढ़ी बेचैनी

लगातार दबाव, जगह बदलने की मजबूरी और रसद की कमी ने माओवादी दस्ते को कमजोर कर दिया है। घने साल जंगलों की वजह से हवाई निगरानी चुनौतीपूर्ण है, इसलिए सुरक्षा बल अब ह्यूमन इंटेलिजेंस और छोटे-छोटे ग्रुप्स में सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं।

‘डेथ जोन’ में निर्णायक घेराबंदी

विशेषज्ञों के मुताबिक, सारंडा का यह इलाका ‘डेथ जोन’ के नाम से जाना जाता है, जहां भूगोल ही सबसे बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद जिस तरह से फॉरवर्ड बेस बनाकर सुरक्षा बलों ने घेराबंदी की है, उससे साफ संकेत मिलते हैं कि यह माओवादी नेतृत्व के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई है।

अब हालात ऐसे हैं कि मिसिर बेसरा के सामने सिर्फ दो ही विकल्प बचे हैं—या तो आत्मसमर्पण, या फिर अंतिम मुठभेड़। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इस ऑपरेशन के बाद झारखंड में माओवाद की कमर पूरी तरह टूट सकती है।

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