वरिष्ठ पत्रकार सोहन सिंह
रांची। Operation Daura Pahar: कभी झारखंड के घने जंगलों में माओवादियों का ऐसा वर्चस्व था कि सूरज ढलते ही सरकारी गतिविधियां लगभग ठहर जाती थीं। सारंडा, बूढ़ा पहाड़, पारसनाथ, दलमा, कोल्हान और पलामू-लातेहार के दुर्गम वन क्षेत्र वर्षों तक भाकपा (माओवादी) के अभेद्य गढ़ माने जाते रहे।
जन अदालतें, लेवी वसूली, बारूदी सुरंगें और सुरक्षा बलों पर घात लगाकर किए जाने वाले हमले यहां की पहचान बन चुके थे। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में सुरक्षा बलों की रणनीतिक कार्रवाई, आधुनिक तकनीक, सटीक खुफिया तंत्र और विकास आधारित नीति ने इस पूरे परिदृश्य को बदल दिया है। अब वही जंगल सुरक्षा कैंपों, नई सड़कों और विकास परियोजनाओं के लिए चर्चा में हैं।
Operation Daura Pahar: जहां लाल झंडे लहराते थे, वहां अब तिरंगे की मजबूत मौजूदगी
एक समय सारंडा के जंगलों में माओवादी प्रशिक्षण शिविर संचालित होते थे। बूढ़ा पहाड़ संगठन का सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाता था, जबकि दलमा, पारसनाथ और कोल्हान के जंगल शीर्ष कमांडरों की गतिविधियों के केंद्र थे। सरकारी योजनाओं की पहुंच इन इलाकों तक लगभग नहीं थी। आज सुरक्षा बलों के स्थायी कैंप, नई सड़कें, मोबाइल नेटवर्क और प्रशासनिक पहुंच ने हालात पूरी तरह बदल दिए हैं। यही परिवर्तन माओवादियों के जनाधार और प्रभाव को कमजोर करने में निर्णायक साबित हुआ।
Operation Daura Pahar: रणनीति बदली, जंगल की लड़ाई का पूरा समीकरण बदल गया
सुरक्षा बल द्वारा अभियान चलाते से अब रणनीति पूरी तरह बदल चुकी है। ड्रोन निगरानी, सैटेलाइट आधारित खुफिया जानकारी, आधुनिक हथियार, स्थानीय इंटेलिजेंस नेटवर्क तथा झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ, कोबरा, झारखंड जगुआर और केंद्रीय एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय ने माओवादी नेटवर्क पर लगातार दबाव बनाए रखा। इसका परिणाम यह हुआ कि संगठन को अपने सुरक्षित ठिकाने छोड़ने पड़े और उसका नेतृत्व लगातार कमजोर होता गया।
वे अभियान जिन्होंने बदल दी झारखंड की तस्वीर
ऑपरेशन ग्रीन हंट ने पहली बार बड़े स्तर पर माओवादी नेटवर्क को चुनौती दी और जंगलों के भीतर तक सुरक्षा बलों की प्रभावी पहुंच बनाई।
ऑपरेशन एनाकोंडा (2011) ने सारंडा के जंगलों में माओवादियों की मजबूत पकड़ तोड़ी और वहां स्थायी सुरक्षा कैंपों की स्थापना का रास्ता खोला।
ऑपरेशन ऑक्टोपस ने बारूदी सुरंगों से घिरे बूढ़ा पहाड़ जैसे दुर्गम इलाके को माओवादी प्रभाव से मुक्त कराने में अहम भूमिका निभाई।
ऑपरेशन मेधाबुरू के दौरान कोल्हान और चाईबासा क्षेत्र में कई बंकर ध्वस्त किए गए तथा भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक बरामद हुए।
ऑपरेशन कौलेश्वरी ने चतरा और उत्तरी झारखंड में माओवादी प्रभाव को कमजोर कर सुरक्षा व्यवस्था को नई मजबूती दी।
ऑपरेशन कांति में 20 लाख रुपये के इनामी रीजनल कमांडर रविंद्र गंझू की गिरफ्तारी ने संगठन की कमान को बड़ा झटका दिया।
ऑपरेशन अजय के तहत 25 लाख रुपये के इनामी विशेष क्षेत्रीय समिति (SAC) कमांडर अजय महतो उर्फ मोछू की गिरफ्तारी सुरक्षा बलों की बड़ी उपलब्धि मानी गई।
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ऑपरेशन दौरा पहाड़ हाल के वर्षों का सबसे बड़ा अभियान बनकर सामने आया। इसमें 2.20 करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष माओवादी मिसिर बेसरा सहित कई बड़े कमांडरों की गिरफ्तारी ने संगठन के शीर्ष नेतृत्व ढांचे को गहरा झटका दिया।
ऑपरेशन नवजीवन-II ने सुरक्षा कार्रवाई के साथ पुनर्वास नीति को भी मजबूती दी। 28 जुलाई 2026 को 15 लाख रुपये के इनामी संतोष उर्फ बासुदेव दा समेत 16 हार्डकोर नक्सलियों के आत्मसमर्पण ने स्पष्ट संकेत दिया कि अब जंगलों में बंदूक की जगह मुख्यधारा की राह चुनी जा रही है।
गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण से टूटी संगठन की कमान
हाल के महीनों में कई शीर्ष कमांडरों की गिरफ्तारी और बड़ी संख्या में नक्सलियों के आत्मसमर्पण ने भाकपा (माओवादी) के नेतृत्व, लॉजिस्टिक नेटवर्क और कैडर संरचना को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि लगातार दबाव के कारण संगठन लगभग समाप्ति की ओर है
बंदूक नहीं, विकास बना सबसे बड़ा हथियार
झारखंड में माओवाद के कमजोर होने के पीछे सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ विकास की तेज रफ्तार भी बड़ी वजह बनी। सड़क, पुल, स्कूल, अस्पताल, बिजली, मोबाइल नेटवर्क, पेयजल और सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ने से ग्रामीणों का भरोसा प्रशासन पर मजबूत हुआ। जिन गांवों में कभी विकास का नामोनिशान नहीं था, वहां अब सरकारी सेवाएं नियमित रूप से पहुंच रही हैं। यही बदलाव माओवादियों के जनाधार को सबसे अधिक कमजोर करने वाला कारक माना जा रहा है।
अब अंतिम चरण की चुनौती
झारखंड पुलिस का मानना है कि राज्य में माओवादी संगठन पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुका है और समाप्ति के अंतिम चरण में है। हालांकि कुछ सक्रिय नक्सली अब भी चुनौती बने हुए हैं। इसलिए अभियान जारी रहेगा, ताकि झारखंड को पूरी तरह माओवादी हिंसा से मुक्त किया जा सके।
नई पहचान गढ़ता झारखंड
कभी लाल आतंक, बारूदी सुरंगों और बंदूकों की गूंज से पहचाने जाने वाले झारखंड की तस्वीर तेजी से बदल रही है। जिन जंगलों में कभी माओवादियों का साम्राज्य था, वहां आज विकास की रफ्तार दिखाई देती है। सड़क निर्माण की मशीनों की आवाज, स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई और गांवों तक पहुंचता प्रशासन इस बात का संकेत है कि झारखंड अब संघर्ष की नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और विश्वास की नई कहानी लिख रहा है।
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