झारखंड में नक्सलवाद अंतिम कगार पर, 7 हॉटस्पॉट नक्सल मुक्त; अब सिर्फ 9 नक्सली सक्रिय
Ranchi: कभी झारखंड के कई सुदूर और संवेदनशील इलाकों में नक्सलियों का प्रभाव इतना मजबूत था कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर भी सुरक्षा बलों के सामने बड़ी चुनौती रहती थी। स्कूलों, सरकारी भवनों और सार्वजनिक स्थानों के आसपास आईईडी लगाने से लेकर सुरक्षा बलों को निशाना बनाने तक की घटनाएं सामने आती थीं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में लगातार चलाए गए सुरक्षा अभियानों, बेहतर खुफिया तंत्र और रणनीतिक बदलावों के बाद राज्य में नक्सली गतिविधियां अब अपने अंतिम दौर में पहुंचती दिखाई दे रही हैं।
पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड के 7 प्रमुख नक्सल हॉटस्पॉट पूरी तरह नक्सल मुक्त किए जा चुके हैं। वहीं राज्य में अब केवल 9 सक्रिय नक्सलियों के बचे होने की जानकारी सामने आई है।
झारखंड में 6, बंगाल सीमा पर 3 नक्सली सक्रिय
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार बचे हुए 9 नक्सलियों में से 6 झारखंड के अंदरूनी इलाकों में सक्रिय हैं, जबकि 3 नक्सलियों की गतिविधियां पश्चिम बंगाल की सीमा से लगे इलाकों में देखी जा रही हैं।
इन सभी के संभावित ठिकानों और गतिविधियों पर सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों की लगातार नजर है। अधिकारियों का मानना है कि बचे हुए नक्सलियों के खिलाफ अभियान को तेज कर उन्हें या तो गिरफ्तार किया जाएगा या आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया जाएगा।
सरकार की ओर से नक्सलियों के लिए आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति का विकल्प भी खुला रखा गया है। हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों को इस नीति के तहत पुनर्वास का लाभ दिया जा सकता है।
सारंडा में एडवांस कैंप बने गेमचेंजर
नक्सलियों के सबसे मजबूत गढ़ों में शामिल पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा क्षेत्र में सुरक्षा बलों की रणनीति में बड़ा बदलाव किया गया। घने जंगलों और दुर्गम इलाकों में एडवांस लोकेशन कैंप स्थापित किए गए।
इन कैंपों की मदद से सुरक्षा बल उन इलाकों तक अपनी स्थायी पहुंच बनाने में सफल हुए, जहां पहले नक्सलियों की मजबूत पकड़ मानी जाती थी।
सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी का असर नक्सलियों की आवाजाही और रसद व्यवस्था पर पड़ा। हथियार, गोला-बारूद, भोजन और अन्य जरूरी सामान की आपूर्ति के रास्ते बाधित होने से नक्सली संगठनों पर दबाव बढ़ा।
मजबूत इंटेलिजेंस नेटवर्क से बढ़ी कार्रवाई
नक्सल विरोधी अभियान में सिर्फ सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ाने के बजाय इंटेलिजेंस नेटवर्क को भी मजबूत किया गया। स्थानीय स्तर से मिलने वाली सूचनाओं के आधार पर जंगलों और संभावित नक्सली ठिकानों में अभियान चलाए गए।
लगातार कॉम्बिंग ऑपरेशन, रणनीतिक कैंप, बेहतर खुफिया तंत्र और सुरक्षाबलों की लगातार मौजूदगी ने नक्सली संगठनों की गतिविधियों को सीमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आत्मसमर्पण नीति से भी कमजोर हुआ संगठन
सुरक्षा अभियान के साथ सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति का भी असर दिखाई दिया है। कई नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का विकल्प चुना है।
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि लगातार दबाव और पुनर्वास के विकल्प के कारण संगठन के निचले स्तर के कैडरों में भी असंतोष बढ़ा है। इससे नक्सली नेटवर्क को कमजोर करने में मदद मिली है।
अब अंतिम 9 नक्सलियों पर नजर
झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान अब निर्णायक दौर में पहुंच गया है। सात प्रमुख हॉटस्पॉट के नक्सल मुक्त होने और सक्रिय नक्सलियों की संख्या घटकर नौ रह जाने के बाद सुरक्षा एजेंसियों का फोकस अब बचे हुए नक्सलियों पर है।
अधिकारियों का दावा है कि यदि अभियान इसी तरह जारी रहा तो आने वाले समय में झारखंड को पूरी तरह नक्सल मुक्त बनाने की दिशा में बड़ी सफलता मिल सकती है।
हालांकि, सुरक्षा एजेंसियां यह भी मानती हैं कि अंतिम चरण में अभियान को और अधिक सतर्कता के साथ चलाना होगा, क्योंकि बचे हुए नक्सली जंगलों और सीमावर्ती इलाकों का फायदा उठाकर अपनी गतिविधियां जारी रखने की कोशिश कर सकते हैं।
ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या झारखंड जल्द ही अपने आखिरी सक्रिय नक्सली नेटवर्क को भी खत्म कर पूरी तरह नक्सल मुक्त राज्य बनने की ओर बढ़ पाएगा?
