राँची: PESA Rules 2025: Jharkhand के लोकतांत्रिक इतिहास में 23 दिसंबर 2025 की तारीख एक मील का पत्थर साबित हुई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में बहुप्रतीक्षित ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025’ को हरी झंडी दे दी गई। राज्य गठन के 25वें वर्ष में लिया गया यह निर्णय राज्य के 15 अनुसूचित जिलों की लगभग 16,000 ग्राम सभाओं को वह संवैधानिक शक्ति प्रदान करेगा, जिसका इंतज़ार पिछले ढाई दशकों से किया जा रहा था।
इस कानून के लागू होने से अब झारखंड के आदिवासी समाज को अपनी परंपराओं, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों पर वह नियंत्रण प्राप्त होगा, जिसे संविधान की पाँचवीं अनुसूची और पेसा अधिनियम 1996 में सुनिश्चित किया गया था।
PESA Rules 2025: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भूरिया समिति से पेसा तक
पेसा (PESA) अधिनियम, 1996 का इतिहास दिलीप सिंह भूरिया समिति (1994) की सिफारिशों से जुड़ा है। समिति ने माना था कि आदिवासियों की अपनी विशिष्ट शासन परंपराएं हैं, जिन्हें मुख्यधारा के पंचायती राज कानून में जगह नहीं मिली थी। इसी कमी को दूर करने के लिए 24 दिसंबर 1996 को केंद्रीय पेसा कानून बना, लेकिन झारखंड में इसके नियम (Rules) बनने में 29 साल का समय लग गया। 2025 की यह नियमावली अब उस संवैधानिक शून्य को भरेगी।
ग्राम सभा: अब गाँव की ‘सुप्रीम कोर्ट’ और ‘संसद’
नई नियमावली के तहत शासन का केंद्र अब राँची का सचिवालय नहीं, बल्कि गाँव की ग्राम सभा होगी। कैबिनेट द्वारा अनुमोदित प्रावधानों के अनुसार, ग्राम सभा को निम्नलिखित व्यापक अधिकार दिए गए हैं:
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भूमि और संसाधनों पर वीटो पावर: किसी भी सरकारी या निजी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य होगी। इसके बिना किसी भी आदिवासी जमीन का हस्तांतरण संभव नहीं होगा।
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लघु खनिज और वनोपज: बालू, पत्थर और मिट्टी जैसे लघु खनिजों के प्रबंधन का अधिकार अब ग्राम सभा के पास होगा। साथ ही, तेंदू पत्ता, महुआ और अन्य लघु वनोपज की खरीद-बिक्री के लिए न्यूनतम मूल्य निर्धारण और मालिकाना हक भी ग्रामीणों को दिया गया है।
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विकास योजनाओं का नियंत्रण: गाँव में चलने वाली सभी विकास योजनाओं (जैसे सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र) का सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) और गुणवत्ता जांच अब ग्राम सभा करेगी। लाभुकों का चयन भी अब स्थानीय स्तर पर होगा, जिससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।
PESA Rules 2025: पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही तय
पेसा नियमावली 2025 का सबसे क्रांतिकारी पहलू पुलिस की शक्तियों को विनियमित करना है। नए नियमों के अनुसार:
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यदि पुलिस किसी ग्रामीण को गिरफ्तार करती है, तो उसे 48 घंटे के भीतर संबंधित ग्राम सभा को सूचित करना होगा।
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गाँव के भीतर शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को ग्राम सभा के साथ समन्वय करना होगा।
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स्थानीय छोटे विवादों को सुलझाने के लिए ग्राम सभा को 1000 रुपये तक का आर्थिक दंड लगाने की शक्ति दी गई है, ताकि छोटे मामलों के लिए ग्रामीणों को अदालतों के चक्कर न काटने पड़ें।
पारंपरिक स्वशासन को मिला ‘कानूनी कवच’
झारखंड की पारंपरिक शासन प्रणालियाँ—जैसे मुंडा-मानकी, मांझी-परगना, और पाहन-महतो व्यवस्था—को अब तक कानूनी मान्यता का अभाव था। 2025 की नियमावली ने इन पारंपरिक प्रधानों को ग्राम सभा की बैठकों की अध्यक्षता करने का कानूनी अधिकार दे दिया है। प्रत्येक राजस्व गाँव (Revenue Village) में एक स्वतंत्र ग्राम सभा होगी, जो अपनी विशिष्ट रूढ़िवादी परंपराओं और रीति-रिवाजों को अधिसूचित (Notify) कर सकेगी।
PESA Rules 2025: सामाजिक बुराइयों के खिलाफ सख्त अधिकार
आदिवासी क्षेत्रों में शोषण का मुख्य कारण नशा और अवैध साहूकारी रहा है। नई नियमावली ग्राम सभा को यह शक्ति देती है कि वह गाँव में शराब की बिक्री और उपभोग को नियंत्रित कर सके। इसके अलावा, गांव में काम करने वाले साहूकारों (Money lenders) पर लगाम लगाने और ऋण की शर्तों को विनियमित करने का अधिकार भी अब ग्रामीणों के हाथ में होगा।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और भविष्य की राह
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे “दिशोम गुरु शिबू सोरेन के सपनों की जीत” बताया है। उन्होंने कहा कि यह कानून केवल कागजी नहीं होगा, बल्कि इसे जमीन पर उतारने के लिए जिला प्रशासन को विशेष निर्देश जारी किए गए हैं।
वहीं, विपक्ष (भाजपा) ने इसे अपने संघर्षों की जीत बताया है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा कि यद्यपि वे इस फैसले का स्वागत करते हैं, लेकिन यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नियमों में पारंपरिक रूढ़िवादी व्यवस्था के साथ कोई समझौता न हो।
झारखंड हाईकोर्ट के निरंतर दबाव और आदिवासी संगठनों के लंबे आंदोलन के बाद ‘पेसा नियमावली 2025’ का आना राज्य के लिए एक नई शुरुआत है। अब चुनौती इसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। यदि ग्राम सभाएं जागरूक होकर इन शक्तियों का उपयोग करती हैं, तो यह न केवल पलायन को रोकेगा बल्कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के संकल्प को भी सिद्ध करेगा।
