
खनिज अधिकार से SIR तक, 25-26 नवंबर को विधानसभा में केंद्र से भिड़ेगी हेमंत सरकार, सत्ता पक्ष-विपक्ष होंगे आमने-सामने
झारखंड विधानसभा का 25 और 26 नवंबर को प्रस्तावित विशेष सत्र खनिज राजस्व और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर केंद्र-राज्य टकराव का मंच बन सकता है। सरकार जहां इसे राज्य के अधिकारों की लड़ाई बता रही है, वहीं विपक्ष वित्तीय दावों और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने की तैयारी में है।
रांची: झारखंड की राजनीति में केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव एक बार फिर तेज होता दिख रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम यानी MMDR एक्ट के मुद्दे पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया है। 25 और 26 नवंबर को प्रस्तावित इस सत्र में दोनों विषयों पर चर्चा होगी।
सरकार इसे राज्य के अधिकारों और हितों से जुड़े अहम मुद्दों पर विचार-विमर्श का अवसर बता रही है। हालांकि, सत्र के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। खनिज राजस्व और मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसे मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस की संभावना है।
खनिज राजस्व की लड़ाई में दांव पर झारखंड की आर्थिक स्वायत्तता
MMDR एक्ट को लेकर झारखंड सरकार की प्रमुख आपत्ति खनिज संसाधनों पर राज्य के अधिकार और उनसे मिलने वाले राजस्व से जुड़ी है। राज्य सरकार का तर्क है कि खनिजों पर सेस लगाने के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संसद में नया कानून लाने की जरूरत और उसके प्रभाव पर स्पष्टता होनी चाहिए।
सरकार को आशंका है कि नए कानूनी प्रावधानों का असर राज्य के राजस्व और पुराने बकाये की दावेदारी पर पड़ सकता है। झारखंड जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्य के लिए खनिजों से मिलने वाली राशि आर्थिक जरूरतों और कल्याणकारी योजनाओं के संचालन में अहम भूमिका निभाती है।
मंईयां सम्मान योजना जैसी योजनाओं पर होने वाले खर्च का हवाला देते हुए राज्य सरकार खनिज राजस्व के मुद्दे को वित्तीय स्वायत्तता से जोड़ रही है। सरकार की दलील है कि राज्य के संसाधनों से मिलने वाले राजस्व पर उसके हितों की रक्षा जरूरी है।
केंद्र और बीजेपी का तर्क क्या है?
इस विवाद में केंद्र का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। बीजेपी की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा है कि खनिजों से मिलने वाली रॉयल्टी का बड़ा हिस्सा राज्यों को प्राप्त होता है। ऐसे में नए कानून से राज्यों को नुकसान होने के दावे का आकलन कानून के प्रावधानों और राजस्व के आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।
खनिज राजस्व पर वास्तविक प्रभाव कितना होगा, यह राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि कानूनी प्रावधानों और वित्तीय आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट हो सकेगा। विशेष सत्र में इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस होने की संभावना है।
SIR पर विरोध, लेकिन सवालों के जवाब भी जरूरी
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर कांग्रेस समेत इंडिया गठबंधन के कई दल देशभर में विरोध जता रहे हैं। झारखंड में भी गठबंधन के घटक दल इस मुद्दे पर मुखर हैं। राज्य सरकार विधानसभा के विशेष सत्र में SIR पर चर्चा करना चाहती है।
वहीं, बीजेपी की ओर से विपक्ष के विरोध को राजनीतिक कदम बताया जाता रहा है। विपक्ष का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठाई जा रही आपत्तियों को ठोस तथ्यों के साथ सामने लाना होगा।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण में कहां और किस तरह की गड़बड़ी की आशंका है, इसके समाधान के लिए क्या विकल्प हैं और मतदाताओं की चिंताओं को कैसे दूर किया जा सकता है—ये सवाल विशेष सत्र में चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं।
पुराने प्रस्तावों का अनुभव, नए सत्र से उम्मीदें
झारखंड विधानसभा में इससे पहले सरना धर्म कोड और OBC आरक्षण जैसे मुद्दों पर भी विशेष सत्रों में चर्चा हो चुकी है। इन विषयों पर राजनीतिक सहमति और आगे की कार्रवाई को लेकर सवाल बने हुए हैं।
ऐसे में इस बार के विशेष सत्र की सफलता केवल चर्चा या प्रस्ताव पारित करने तक सीमित नहीं होगी। उसके ठोस परिणाम और केंद्र के सामने राज्य के पक्ष को किस तरह रखा जाता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
MMDR एक्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी का जिक्र भी सरकार की रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है। हालांकि, इस दिशा में आगे की कार्रवाई और कानूनी पहल का स्पष्ट विवरण सामने आना बाकी है।
हेमंत सरकार के लिए राजनीतिक संदेश से आगे की चुनौती
25 और 26 नवंबर का विशेष सत्र हेमंत सोरेन सरकार के लिए राज्य के अधिकारों और हितों की लड़ाई को विधानसभा में उठाने का अवसर होगा। वहीं, विपक्ष को सरकार के वित्तीय दावों, कानूनी तर्कों और फैसलों पर सवाल उठाने का मौका मिलेगा।
अब निगाहें विशेष सत्र पर टिकी हैं। क्या विधानसभा से निकला प्रस्ताव केंद्र पर दबाव बनाने में सफल होगा? क्या SIR पर उठाए गए सवालों को ठोस आधार मिलेगा? और क्या खनिज राजस्व विवाद में झारखंड को कोई स्पष्ट दिशा मिलेगी?
इन सवालों के जवाब तय करेंगे कि हेमंत सरकार का यह विधानसभा दांव कितना असरदार साबित होता है।



