झारखंड में कमजोर पड़ रहा उग्रवाद, TPC और JJMP जैसे संगठन खात्मे की कगार पर
रांची | विशेष रिपोर्ट
झारखंड में कभी आतंक और समानांतर सत्ता का प्रतीक रहे कई उग्रवादी संगठन अब अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं। प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) से टूटकर बने तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) और झारखंड जनमुक्ति परिषद (JJMP) जैसे संगठन पुलिस की लगातार कार्रवाई, नेतृत्व संकट और अंदरूनी टूट की वजह से लगभग समाप्ति की ओर बढ़ चुके हैं।
सुरक्षाबलों के बढ़ते दबाव और सरकार की आत्मसमर्पण नीति के कारण इन संगठनों के कई शीर्ष कमांडर या तो गिरफ्तार हो चुके हैं, मुठभेड़ों में मारे गए हैं या फिर मुख्यधारा में लौट चुके हैं। जो बचे हैं, वे भूमिगत होकर अपनी पहचान बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
TPC: कभी 9 जिलों में था प्रभाव, अब अस्तित्व बचाने की जंग
साल 2002 में माओवादी संगठन से अलग होकर बना TPC कभी झारखंड के चतरा, पलामू, लातेहार समेत कई जिलों में प्रभाव रखता था। संगठन ने खुद को माओवादियों के विकल्प के रूप में पेश किया और देखते ही देखते अपना मजबूत नेटवर्क खड़ा कर लिया।
लेकिन समय के साथ पुलिस कार्रवाई और संगठन के भीतर लगातार कमजोर होते नेतृत्व ने इसकी ताकत कम कर दी। वर्तमान में संगठन का प्रमुख चेहरा ब्रजेश गंझू भूमिगत बताया जाता है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार संगठन में अब गिने-चुने सक्रिय सदस्य ही बचे हैं।
माओवादियों से मतभेद के बाद बना था TPC
TPC का गठन केवल वैचारिक मतभेदों के कारण नहीं हुआ था। संगठन के गठन के पीछे सामाजिक और जातीय असंतोष भी एक बड़ी वजह माना जाता है। उस दौर में माओवादी संगठन के भीतर कुछ जातियों के वर्चस्व को लेकर असंतोष था, जिसके बाद कई स्थानीय कमांडरों ने अलग रास्ता चुना।
इसी असंतोष से TPC का जन्म हुआ और कुछ वर्षों में यह झारखंड के उग्रवादी परिदृश्य का बड़ा नाम बन गया।
JJMP का उदय और पतन
TPC की तरह झारखंड जनमुक्ति परिषद (JJMP) भी माओवादी संगठन से अलग होकर अस्तित्व में आया था। संगठन की स्थापना 2008 में हुई और कुछ वर्षों तक इसका प्रभाव लातेहार, लोहरदगा, गुमला और आसपास के इलाकों में देखने को मिला।
JJMP को सबसे ज्यादा पहचान उसके सुप्रीमो पप्पू लोहरा के नेतृत्व में मिली। लेकिन सुरक्षा बलों की कार्रवाई में पप्पू लोहरा के मारे जाने के बाद संगठन तेजी से बिखर गया।
इसके बाद कई कमांडरों ने आत्मसमर्पण कर दिया, जबकि अन्य गिरफ्तार कर लिए गए। वर्तमान में संगठन लगभग निष्क्रिय माना जा रहा है और सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार इसमें कोई बड़ा सक्रिय इनामी उग्रवादी शेष नहीं बचा है।
बदल रहा है झारखंड का सुरक्षा परिदृश्य
पिछले कुछ वर्षों में झारखंड में नक्सल और उग्रवादी गतिविधियों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, सड़क और संचार नेटवर्क के विस्तार तथा आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का असर जमीनी स्तर पर दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जिन इलाकों में कभी उग्रवादी संगठनों का दबदबा था, वहां अब प्रशासनिक पहुंच बढ़ी है और विकास योजनाओं का प्रभाव भी दिखने लगा है।
निष्कर्ष
एक समय झारखंड की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती माने जाने वाले TPC और JJMP जैसे संगठन अब अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहे हैं। नेतृत्व संकट, पुलिस कार्रवाई और लगातार घटते जनाधार ने इन संगठनों को हाशिए पर पहुंचा दिया है। यह झारखंड में बदलते सुरक्षा माहौल और उग्रवाद विरोधी अभियानों की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।
