
सस्ता स्वाभिमान, महंगी कुर्सी? झारखंड कांग्रेस की अंदरूनी कलह पर उठते सवाल
रांची: झारखंड की राजनीति में सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन भले ही बाहर से एकजुट नजर आता हो, लेकिन गठबंधन की प्रमुख सहयोगी कांग्रेस के भीतर बढ़ती असहमति और गुटबाजी अब खुलकर सामने आने लगी है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों ने पार्टी के संगठन, नेतृत्व और गठबंधन में उसकी भूमिका को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
समन्वय समिति का गठन अब भी अधर में
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ने करीब छह-सात महीने पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गठबंधन की समन्वय समिति के गठन के लिए पत्र भेजा था। पार्टी ने समिति के लिए तीन नेताओं के नाम भी प्रस्तावित किए थे। हालांकि बताया जा रहा है कि उन नामों पर सहमति नहीं बन सकी, जिसके कारण अब तक समिति का गठन नहीं हो पाया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के भीतर गुटबाजी और अलग-अलग खेमों की सक्रियता भी इस प्रक्रिया में बाधा बनी है।
राज्यसभा चुनाव के बाद बढ़ी नाराजगी
हालिया राज्यसभा चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस के भीतर असंतोष और अधिक बढ़ गया। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से सहयोगी दल झामुमो की भूमिका पर सवाल उठाए। वहीं, पार्टी नेतृत्व की ओर से इन बयानों पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं होने से संगठन की कार्यशैली पर भी चर्चा तेज हो गई है।
इसी तरह कुछ नेताओं की दोबारा पार्टी में वापसी को लेकर भी संगठन के भीतर अलग-अलग राय देखने को मिली।
संगठन और नेतृत्व पर उठ रहे सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि किसी दल में सार्वजनिक बयानबाजी, गुटबाजी और अनुशासनहीनता पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया जाता, तो उसका असर संगठन की मजबूती और जनाधार दोनों पर पड़ता है।
झारखंड कांग्रेस के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती संगठन को मजबूत करने, नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करने और गठबंधन में अपनी राजनीतिक भूमिका को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने की मानी जा रही है।
गठबंधन की राजनीति में संतुलन की चुनौती
झारखंड में कांग्रेस सरकार का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि गठबंधन में उसकी निर्णयकारी भूमिका पहले जैसी प्रभावी नहीं दिख रही। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से सार्वजनिक रूप से गठबंधन की मजबूती और एकजुटता पर जोर दिया जाता रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस संगठनात्मक चुनौतियों से कैसे निपटती है और क्या वह अपने कार्यकर्ताओं तथा नेताओं के बीच विश्वास बहाल कर पाती है।



