
राँची | झारखंड की प्रशासनिक गलियारों में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने राज्य के परिवहन सचिव राजीव रंजन पर नियमों को ताक पर रखकर मात्र 24 घंटे के लिए परिवहन आयुक्त बनने का गंभीर आरोप लगाया है।
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता अजय साह ने एक प्रेस वार्ता के दौरान इस पूरे घटनाक्रम को “प्रशासनिक खेल” करार देते हुए इसकी उच्चस्तरीय समीक्षा की मांग की है।
क्या है पूरा मामला?
अजय साह ने तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि परिवहन सचिव राजीव रंजन ने दो अजीबोगरीब आदेश जारी किए:
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10 मार्च (आदेश संख्या 24): राजीव रंजन ने एक आदेश जारी कर परिवहन आयुक्त के सभी अधिकार कथित रूप से स्वयं के पास ले लिए।
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11 मार्च (आदेश संख्या 25): ठीक अगले ही दिन उन्होंने अपने पिछले आदेश को निरस्त (Cancel) कर दिया।
भाजपा का तर्क: इन दो आदेशों के बीच के 24 घंटों में राजीव रंजन तकनीकी रूप से खुद ही परिवहन आयुक्त बन गए। अजय साह के अनुसार, यह कदम सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और वर्ष 2016 की राज्य गजट अधिसूचना का सीधा उल्लंघन है, जिसमें परिवहन आयुक्त की भूमिका और चयन की स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित है।
BJP की 3 बड़ी मांगें और सवाल
प्रेस वार्ता में अजय साह ने सरकार और विभाग के सामने कड़े सवाल रखे:
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निर्णयों की समीक्षा: उन 24 घंटों के दौरान परिवहन विभाग में कौन सी फाइलें पास हुईं? किन प्रस्तावों को मंजूरी मिली या अस्वीकार किया गया? इसकी बारीकी से जांच होनी चाहिए।
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गोपनीयता पर सवाल: इतने महत्वपूर्ण प्रशासनिक आदेश की कॉपी मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव (जो संबंधित समितियों के अध्यक्ष हैं) को क्यों नहीं दी गई?
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पारदर्शिता का अभाव: आखिर इस “24 घंटे के खेल” के पीछे की मंशा क्या थी और किसे लाभ पहुँचाने की कोशिश की गई, इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
प्रशासनिक ढांचा और नियमों की अनदेखी
अजय साह ने याद दिलाया कि राज्य सड़क सुरक्षा परिषद (अध्यक्ष: मुख्यमंत्री) और कोष प्रबंधन समिति (अध्यक्ष: मुख्य सचिव) जैसी महत्वपूर्ण समितियों में परिवहन आयुक्त ‘सदस्य सचिव’ होता है। ऐसे में नियमों को दरकिनार कर पद की शक्तियों का हस्तांतरण करना गंभीर अनियमितता की श्रेणी में आता है।
प्रेस वार्ता के दौरान प्रदेश मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक भी उपस्थित रहे और उन्होंने भी इस मामले में जवाबदेही तय करने पर जोर दिया।
BJP ने इस मामले को “गुप्त और अवैध” बताते हुए मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है। अब देखना यह है कि परिवहन विभाग और राज्य सरकार इस ‘एक दिन के आयुक्त’ वाले विवाद पर क्या स्पष्टीकरण देती है।



