झारखंड कांग्रेस में घमासान: पूर्व मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने पार्टी नेतृत्व पर उठाए तीखे सवाल
झारखंड की सियासत में कांग्रेस के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। पूर्व मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी ही पार्टी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनकी फेसबुक पोस्ट ने प्रदेश कांग्रेस की रणनीति और नेतृत्व दोनों को कटघरे में ला खड़ा किया है।
दोहरे मापदंड पर सीधा हमला
राधा कृष्ण किशोर ने पार्टी में कथित “डबल स्टैंडर्ड” पर सवाल उठाते हुए पूछा कि
योगेंद्र साव को तीन साल के लिए पार्टी से निष्कासित क्यों किया गया, जबकि दूसरी ओर
रमा खलखो को, पार्टी की आलोचना करने के बावजूद, चुनाव प्रबंधन समिति में जगह दे दी गई।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यह स्थिति “एक आँख में सुरमा और दूसरी में काजल” जैसी है— यानी अलग-अलग लोगों के लिए अलग नियम।
314 सदस्यों की ‘जंबो कमेटी’ पर सवाल
झारखंड की 81 विधानसभा सीटों के लिए बनाई गई 314 सदस्यीय चुनावी समिति को लेकर भी उन्होंने नाराजगी जताई।
उनका कहना है कि इतनी बड़ी कमेटी का प्रभावी संचालन संभव नहीं है और इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया और भी जटिल हो सकती है।
उन्होंने इसे “जंबो-जेट समिति” बताते हुए पूछा कि क्या यह वास्तव में चुनावी रणनीति को मजबूत करेगी या सिर्फ गुटबाजी को बढ़ाएगी।
संगठन को लेकर दी सख्त सलाह
किशोर ने पार्टी नेतृत्व को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि कांग्रेस को अन्य राज्यों के चुनावी परिणामों से सीख लेने की जरूरत है।
उन्होंने सुझाव दिया कि संगठन को मजबूत करने के लिए दिखावटी विस्तार की बजाय नेतृत्व स्तर पर ठोस और कड़े फैसले लेने होंगे।
हजारीबाग का लापता परिवार: उठाया गंभीर मुद्दा
इस पोस्ट में उन्होंने एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दे को भी उठाया।
मो. तनवीर अंसारी के अनुसार, हजारीबाग के एक ही परिवार के तीन सदस्य 23 अप्रैल 2026 से लापता हैं।
पुलिस का कहना है कि वे अजमेर शरीफ दरगाह चले गए हैं, लेकिन परिजन अब भी अनिश्चितता और चिंता में हैं। इस मामले ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक संकेत: अंदरूनी ‘कोल्ड वार’ तेज
राधा कृष्ण किशोर की यह पोस्ट केवल नाराजगी नहीं, बल्कि झारखंड कांग्रेस के भीतर चल रही गहरी गुटबाजी और असंतोष का संकेत मानी जा रही है।
ऐसे समय में जब चुनावी तैयारियां तेज होनी चाहिए, पार्टी के भीतर ही उठ रहे सवाल संगठन के लिए चुनौती बन सकते हैं।
निष्कर्ष
झारखंड कांग्रेस में उठी यह आवाज बताती है कि अंदरूनी मतभेद अब दबे नहीं रह गए हैं। यदि समय रहते इन मुद्दों पर स्पष्टता और संतुलन नहीं बनाया गया, तो इसका असर आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है।



