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Jharkhand News: रांची में बालू माफियाओं का ‘मकड़ी जाल’, हर 2 किमी पर निगरानी तंत्र

राजधानी में बालू का काला खेल: 100+ डंपिंग यार्ड, रोज सैकड़ों गाड़ियों की एंट्री

Jharkhand News: झारखंड की राजधानी रांची में अवैध बालू कारोबार अब छोटे स्तर की गतिविधि नहीं रहा, बल्कि एक संगठित सिंडिकेट का रूप ले चुका है। बुंडू, सोनाहातू और सिल्ली इलाकों से बड़े पैमाने पर बालू की तस्करी की जा रही है, और इस पूरे नेटवर्क को माफियाओं ने बेहद सुनियोजित तरीके से खड़ा किया है।

सूत्र बताते हैं कि इस अवैध धंधे की सबसे बड़ी खासियत इसका ‘मकड़ी जाल’ जैसा नेटवर्क है। नदी घाट से लेकर डंपिंग यार्ड तक हर दो किलोमीटर पर माफियाओं के लोग तैनात रहते हैं, जो हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। जैसे ही किसी तरह की हलचल होती है, तुरंत पूरी चेन को सूचना पहुंचा दी जाती है।

बुंडू-नामकुम क्षेत्र के एक कारोबारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि वर्षों से इस काम में जुड़े लोग अब वैध रास्ता अपनाना चाहते हैं, लेकिन घाटों की नीलामी नहीं होने से मजबूरी में अवैध कारोबार की ओर झुकाव बढ़ गया है।

इस पूरे सिस्टम में गाड़ियों के हिसाब से रेट तय हैं। हाइवा, टर्बो और ट्रैक्टर के लिए अलग-अलग दरें निर्धारित हैं और उसी के अनुसार बालू की ढुलाई होती है। यानी यह धंधा पूरी तरह एक तय ‘रेट सिस्टम’ पर चल रहा है।

स्थानीय स्तर पर भी कुछ नाम चर्चा में हैं, जिन पर इस नेटवर्क को संचालित करने का आरोप लगाया जा रहा है। बताया जाता है कि नदी से बालू निकालने से लेकर अवैध कमाई के संग्रह तक की पूरी प्रक्रिया एक संगठित तरीके से चलाई जाती है।

जानकारी के मुताबिक, रांची जिले में 100 से ज्यादा अवैध डंपिंग यार्ड बनाए गए हैं। इन यार्डों में पहले बालू जमा किया जाता है, फिर जरूरत के अनुसार शहर के अलग-अलग इलाकों में सप्लाई की जाती है।

रोजाना के आंकड़े इस कारोबार की गंभीरता को दिखाते हैं। अकेले बुंडू और सिल्ली से ही प्रतिदिन 200-200 से ज्यादा हाइवा बालू लेकर निकलते हैं। इसके अलावा आसपास के जिलों से भी सैकड़ों गाड़ियां रांची पहुंचती हैं। तस्करी के लिए बाकायदा रूट भी तय हैं। सिल्ली से टाटीसिल्वे होते हुए बालू शहर में आता है, जबकि बुंडू और सोनाहातू से नामकुम के रास्ते एंट्री होती है।

राजधानी होने के कारण रांची में बालू की मांग लगातार बनी रहती है, जिसका फायदा यह सिंडिकेट उठा रहा है। प्रशासन समय-समय पर कार्रवाई के दावे जरूर करता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह अवैध कारोबार अब भी बेखौफ जारी है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या इस ‘मकड़ी जाल’ जैसे नेटवर्क को तोड़ने के लिए प्रशासन कोई ठोस और स्थायी कदम उठा पाएगा या यह खेल यूं ही चलता रहेगा।

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