रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम के साथ जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से व्लादिमीर पुतिन को ‘गाजा शांति बोर्ड’ (Gaza Board of Peace) में शामिल होने का न्योता देना वैश्विक राजनीति में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है।
ट्रंप का मास्टरस्ट्रोक: गाजा शांति बोर्ड में पुतिन की एंट्री के मायने
डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा में युद्धविराम और पुनर्निर्माण की निगरानी के लिए एक अंतरराष्ट्रीय निकाय ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का गठन किया है। क्रेमलिन ने पुष्टि की है कि पुतिन को इसके लिए औपचारिक निमंत्रण मिल चुका है और रूस इस पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
1. रूस की वैश्विक स्वीकार्यता की वापसी
यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस को पश्चिमी देशों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग करने की कोशिश की थी। ट्रंप का यह निमंत्रण पुतिन को मुख्यधारा की वैश्विक कूटनीति में वापस लाने का एक जरिया बन सकता है। यह दर्शाता है कि ट्रंप प्रशासन रूस को एक ‘विलेन’ के बजाय एक ‘साझेदार’ के रूप में देख रहा है।
2. संयुक्त राष्ट्र (UN) के विकल्प के रूप में नई संस्था?
रूसी मीडिया और विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को चुनौती देने या उसके विकल्प के रूप में खड़ा किया जा रहा है। पुतिन को शामिल करना इस बात का संकेत है कि ट्रंप एक ऐसा नया अंतरराष्ट्रीय निकाय चाहते हैं जो UN की नौकरशाही से दूर और अधिक प्रभावशाली हो।
3. यूक्रेन युद्ध पर शांति वार्ता का आधार
माना जा रहा है कि गाजा के बहाने ट्रंप पुतिन को बातचीत की मेज पर लाना चाहते हैं। यदि दोनों नेता गाजा मुद्दे पर सहयोग करते हैं, तो इसका सीधा असर यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की दिशा में होने वाली भविष्य की वार्ताओं पर भी पड़ेगा। ट्रंप पहले ही यूक्रेन पर शांति के लिए रूस से बात करने की इच्छा जता चुके हैं।
गाजा शांति बोर्ड की मुख्य बातें:
- नेतृत्व: इस बोर्ड के अध्यक्ष खुद डोनाल्ड ट्रंप होंगे।
- सदस्यता: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ, तुर्किये, कनाडा और इटली जैसे देशों को भी न्योता मिला है।
- शर्तें: बोर्ड में स्थायी सीट के लिए 1 बिलियन डॉलर के योगदान की चर्चा है, जबकि योगदान न देने वाले देशों का कार्यकाल 3 साल का होगा।
- लक्ष्य: गाजा का पुनर्निर्माण, हमास का निरस्त्रीकरण और वहां एक नई तकनीकी (Technocratic) सरकार का गठन सुनिश्चित करना।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव के अनुसार, रूस इस प्रस्ताव के सभी ‘पहलुओं’ (Nuances) का अध्ययन कर रहा है। रूस यह देखना चाहता है कि इस बोर्ड की शक्तियां कितनी होंगी और क्या यह वास्तव में अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत काम करेगा।
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