
पटना: बिहार में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) के प्रमुख पशुपति कुमार पारस ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी अब एनडीए का हिस्सा नहीं रही और वे आगामी विधानसभा चुनाव महागठबंधन के साथ मिलकर लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि जल्द ही वे आरजेडी नेता तेजस्वी यादव से मुलाकात कर अंतिम औपचारिक निर्णय लेंगे।
RLJP News: महागठबंधन में शामिल होने के संकेत, तेजस्वी से मिलेंगे पारस
पटना में पार्टी कार्यालय में मीडिया को संबोधित करते हुए पारस ने कहा,
“रालोजपा जल्द ही महागठबंधन का हिस्सा बनेगी। हम तेजस्वी यादव से मिलकर इसका अंतिम निर्णय लेंगे। अब एनडीए से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।”
तेजस्वी यादव इस समय बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और महागठबंधन की कोऑर्डिनेशन कमिटी के अध्यक्ष भी हैं।
RLJP News: NDA पर बड़ा हमला, कहा- दलितों का वोट छीनने की साजिश
पारस ने मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि एनडीए गठबंधन, विशेष रूप से भाजपा, बिहार चुनाव में संभावित हार को देखते हुए दलित और शोषित वर्ग के मतदाताओं को वोट देने से रोकने की साजिश कर रहा है।
पारस बोले: “निर्वाचन आयोग बेहद सीमित समय में मतदाता सूची सत्यापन करा रहा है और ऐसे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं जो गरीबों के पास नहीं होते। हम इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे।”
RLJP News: बीजेपी से नाराजगी का पुराना इतिहास
पशुपति पारस और उनके भतीजे चिराग पासवान के बीच लोजपा की विरासत को लेकर वर्षों से विवाद चल रहा है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने चिराग की अगुवाई वाली लोजपा को प्राथमिकता दी थी और पारस को एक भी सीट नहीं दी। इससे नाराज होकर उन्होंने मोदी कैबिनेट से इस्तीफा तो दे दिया था, लेकिन तब भी वे औपचारिक तौर पर एनडीए में बने रहे।
अब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पारस ने साफ कर दिया है कि वह पूर्ण रूप से एनडीए से अलग हो चुके हैं और नया राजनीतिक अध्याय महागठबंधन के साथ शुरू करने जा रहे हैं।
बिहार चुनाव से पहले बढ़ा सियासी तापमान
बिहार में अक्टूबर-नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले AIMIM, रालोजपा, RJD, कांग्रेस, और वाम दलों के बीच संभावित समीकरणों ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
रालोजपा की संभावित एंट्री से महागठबंधन को सीमांचल व दलित वोट बैंक में मजबूती मिल सकती है।
राजनीतिक विश्लेषण: पासवान वोट बैंक की भूमिका अहम
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि रामविलास पासवान की विरासत आज भी दलित मतदाताओं में गहरी पकड़ रखती है। चिराग के मुकाबले पारस पारंपरिक पासवान समर्थकों में सम्मानित चेहरा माने जाते हैं। ऐसे में अगर वे महागठबंधन से जुड़ते हैं, तो भाजपा के लिए यह एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।



