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Jharkhand राज्य सजा पुनरीक्षण पर्षद की 36वीं बैठक में आजीवन कारावास की सजा काट रहे 23 कैदियों की रिहाई पर सहमति

Ranchi: Jharkhand: रांची की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल की ऊँची दीवारों के पीछे, पिछले बीस वर्षों से माधव (बदला हुआ नाम) के लिए सूरज सिर्फ एक सीमित दायरे में उगता था।

जीवन की एक गलती ने उसे आजीवन कारावास की दहलीज पर खड़ा कर दिया था। लेकिन आज की सुबह कुछ अलग थी। रेडियो पर गूंजती एक खबर ने जेल की बैरकों में उम्मीद की लहर दौड़ दी।

Jharkhand: मुख्यमंत्री का ऐतिहासिक फैसला और बदलती किस्मत

झारखंड के मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन की अध्यक्षता में राज्य सजा पुनरीक्षण पर्षद की 36वीं बैठक संपन्न हुई। इस बैठक में माधव जैसे 23 कैदियों की रिहाई पर अंतिम मुहर लगा दी गई। यह केवल जेल से बाहर जाने का आदेश नहीं था, बल्कि उन लोगों के लिए प्रायश्चित और सुधार का एक नया अवसर था जिन्होंने अपने जीवन के दशकों चारदीवारी में काट दिए थे।

बैठक में मुख्यमंत्री ने न केवल पुलिस अधीक्षकों और जेल प्रशासन की रिपोर्टों की समीक्षा की, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण को भी सर्वोपरि रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि रिहाई का आधार केवल समय काटना नहीं, बल्कि अपराध की प्रवृत्ति और कैदी के आचरण में आया सकारात्मक बदलाव है।

सामाजिक पुनर्वास: केवल रिहाई नहीं, नई शुरुआत

मुख्यमंत्री ने बैठक में एक अत्यंत संवेदनशील पहल की बात कही। उन्होंने निर्देश दिया कि रिहा होने वाले कैदियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए उन्हें सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिया जाए। माधव जैसे कैदियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती समाज का नजरिया और आजीविका होती है।

“रिहाई का अर्थ केवल जेल के फाटक खुलना नहीं है, बल्कि एक नागरिक के रूप में सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिलना भी है।” — मुख्यमंत्री का विजन।

प्रशासन अब इन रिहा हुए व्यक्तियों के लिए एक व्यवस्थित डेटाबेस तैयार कर रहा है। जिला समन्वयकों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे सुनिश्चित करें कि इन लोगों के पास आय सृजन के साधन हों, ताकि वे फिर कभी अपराध की राह पर न मुड़ें।

अंधविश्वास के खिलाफ जंग और महिला सशक्तिकरण

बैठक का एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू ‘डायन-बिसाही’ जैसी कुप्रथाओं पर प्रहार करना था। राज्य में कई कैदी ऐसे हैं जो इसी अंधविश्वास के चलते अपराध कर बैठे। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि ऐसे मामलों से जुड़े कैदियों के साथ मिलकर महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया जाए। यह समाज की जड़ों में बैठे अंधविश्वास को उखाड़ने की एक अनोखी कोशिश है।

एक नई उम्मीद का सूर्यास्त

जब शाम ढली, तो जेल के गलियारों में सन्नाटा तो था, लेकिन उसमें एक शांति थी। माधव ने अपना सामान समेटना शुरू कर दिया है। उसे पता है कि बाहर की दुनिया बदल चुकी है, लेकिन उसे यह भी पता है कि सरकार का ‘पुनर्वास कवच’ उसे टूटने नहीं देगा।

मुख्य सचिव श्री अविनाश कुमार और डीजीपी श्रीमती तदाशा मिश्रा सहित प्रशासन की पूरी टीम इस मिशन में जुटी है कि ये 23 लोग समाज के लिए बोझ नहीं, बल्कि सुधार की एक नई मिसाल बनें। सलाखों के पीछे से शुरू हुई यह कहानी अब खुले आसमान के नीचे एक नए अध्याय की ओर बढ़ रही है।

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