
Raghubar Das: झारखंड में पेसा कानून की अनुपलब्धता को लेकर सत्तारूढ़ हेमंत सोरेन सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा है कि सरकार ‘विदेशी धर्म’ मानने वालों के दबाव में आदिवासी समाज के पारंपरिक स्वशासन के अधिकारों को रोक रही है।
क्या पेसा कानून लागू होने से गिर जायेगी हेमंत सरकार? pic.twitter.com/gOt9OFPR82
— Raghubar Das (@dasraghubar) May 28, 2025
सरना मुख्यमंत्री के रहते भी आदिवासी वंचित: Raghubar Das
प्रदेश भाजपा कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता में रघुवर दास ने कहा:
“एक सरना समाज के मुख्यमंत्री के रहते भी झारखंड का जनजातीय समाज अपने पारंपरिक स्वशासन से वंचित है। क्या पेसा कानून लागू करने से हेमंत सरकार को सत्ता गंवाने का डर है?”
उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार में उच्च पदों पर आसीन कुछ लोग पेसा के विरोध में हैं क्योंकि वे आदिवासी परंपरा से बाहर के धर्मों से जुड़े हुए हैं।
विधिक प्रक्रिया पूरी, फिर भी नियमावली अटकी: Raghubar Das
रघुवर दास ने कहा कि जुलाई 2023 में पेसा नियमावली का प्रारूप जारी कर आम जन से सुझाव मांगे गए थे। मार्च 2024 में महाधिवक्ता द्वारा इसकी वैधानिक स्वीकृति भी दे दी गई थी।
“जब सभी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं, तो कौन सी शक्ति इसे कैबिनेट में आने से रोक रही है?”
उन्होंने दावा किया कि केंद्र और पांच राज्यों (ओडिशा, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और झारखंड) की सहमति के बाद भी नियमावली लागू नहीं की जा रही।
पेसा लागू होने से परंपरागत मुखिया को अधिकार मिलेगा: Raghubar Das
दास ने कहा कि पेसा लागू होने से झारखंड के 112 अनुसूचित प्रखंडों में लघु खनिज, बालू, पत्थर और विकास योजनाओं का नियंत्रण पारंपरिक ग्राम प्रधानों के हाथों में आ जाएगा।
“यही कारण है कि माफिया और सिंडिकेट भी पेसा का विरोध कर रहे हैं।”
विदेशी धर्म के प्रभाव में फैलाया जा रहा भ्रम: Raghubar Das
पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि 2010 से 2017 तक कुछ संगठनों ने पेसा को छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग करते हुए इसे अदालत में चुनौती दी थी।
“सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पेसा 5वीं अनुसूची के तहत ही लागू होगा।”
उन्होंने कहा कि विदेशी धर्म मानने वाले लोग पेसा के माध्यम से सत्ता में प्रवेश करना चाहते हैं, जबकि इसकी मूल भावना पारंपरिक, रूढ़िवादी ग्राम स्वशासन पर आधारित है।
‘सरना कोड पर कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल’
प्रेसवार्ता में मौजूद पूर्व केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत ने कहा कि कांग्रेस ने 1961 की जनगणना से आदिवासी धर्म कोड हटा दिया था और 2012 में संसद में पूछे गए सवाल पर सरना कोड को अव्यावहारिक बताया था।
उन्होंने झामुमो और कांग्रेस पर आदिवासी धर्म और संस्कृति के मुद्दे पर तुष्टिकरण और भ्रम की राजनीति करने का आरोप लगाया।
‘धर्म कॉलम बहाल हो’
रघुवर दास ने आग्रह किया कि जाति प्रमाणपत्र फॉर्म में ‘धर्म कॉलम’ को पुनः बहाल किया जाए, जिसे उनकी सरकार ने जोड़ा था, ताकि आदिवासी समाज की नौकरियां और अधिकार सुरक्षित रह सकें।
यह बयानबाज़ी झारखंड में आदिवासी राजनीति, पेसा कानून और धर्म आधारित पहचान के मुद्दों को लेकर गहराते राजनीतिक संघर्ष को उजागर करती है। जहां भाजपा आदिवासी परंपरा के रक्षक के रूप में अपनी भूमिका को पेश कर रही है, वहीं सत्तारूढ़ झामुमो इसे राजनीतिक लाभ के लिए धर्म आधारित ध्रुवीकरण की रणनीति मान रही है।



