झारखंड के मशरूम: जंगलों की अनमोल सौगात से आधुनिक खेती तक, जानिए हर मशरूम की खासियत
रांची: झारखंड अपनी खनिज संपदा, घने जंगलों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। लेकिन इन सबके बीच राज्य की एक और खास पहचान है—जंगली और खेती वाले मशरूम। हर साल मानसून की पहली बारिश के साथ ही झारखंड के जंगलों में कई दुर्लभ और पौष्टिक मशरूम प्राकृतिक रूप से उग आते हैं। इनमें रुगड़ा, पुटू और खुखड़ी जैसे जंगली मशरूम शामिल हैं, जबकि बटन, ऑयस्टर, पैडी स्ट्रॉ, मिल्की और शिटाके जैसे मशरूम अब आधुनिक खेती के जरिए किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बन रहे हैं।
स्वाद, पोषण और औषधीय गुणों से भरपूर इन मशरूमों की मांग लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि झारखंड में मशरूम उत्पादन अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्वरोजगार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।
रुगड़ा: झारखंड का ‘सफेद सोना’
झारखंड का सबसे चर्चित और लोकप्रिय जंगली मशरूम रुगड़ा है। यह मुख्य रूप से जून से सितंबर के बीच अच्छी बारिश के बाद साल (सखुआ) के जंगलों की मिट्टी के अंदर प्राकृतिक रूप से उगता है। स्थानीय ग्रामीण इसे जंगलों से खोजकर निकालते हैं और हाट-बाजारों में बेचते हैं।
रुगड़ा को कई लोग “शाकाहारियों का देसी मटन” भी कहते हैं। इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन और कई आवश्यक खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसकी उपलब्धता सीमित होने के कारण कई बार इसकी कीमत 800 से 1000 रुपये प्रति किलो या उससे अधिक तक पहुंच जाती है। रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, लातेहार और पश्चिमी सिंहभूम के बाजारों में इसकी सबसे अधिक मांग रहती है।
बटन मशरूम
बटन मशरूम दुनिया का सबसे अधिक खाया जाने वाला मशरूम है। इसका सफेद रंग, मुलायम बनावट और हल्का स्वाद इसे हर वर्ग के लोगों की पसंद बनाता है।
झारखंड में भी कई किसान आधुनिक तकनीक से इसकी खेती कर अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। होटल, रेस्तरां और घरों में इसका उपयोग सब्जी, सूप, पिज्जा, पास्ता और सलाद सहित कई व्यंजनों में किया जाता है।
ऑयस्टर (ढिंगरी) मशरूम
ऑयस्टर या ढिंगरी मशरूम की खेती झारखंड में तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसकी खेती धान और गेहूं के पुआल पर कम लागत में आसानी से की जा सकती है।
कम निवेश, कम जगह और कम समय में उत्पादन होने के कारण यह स्वयं सहायता समूहों, महिलाओं और छोटे किसानों के लिए रोजगार का बेहतर विकल्प बन चुका है।
पैडी स्ट्रॉ मशरूम
धान उत्पादक क्षेत्रों के लिए पैडी स्ट्रॉ मशरूम की खेती बेहद लाभदायक मानी जाती है। इसकी खेती धान के पुआल पर की जाती है और यह कम समय में तैयार हो जाता है। झारखंड के कई किसान इसे अतिरिक्त आय के स्रोत के रूप में अपना रहे हैं।
मिल्की मशरूम
मिल्की मशरूम अपने आकर्षक सफेद रंग और लंबी शेल्फ लाइफ के कारण बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है और इसका व्यावसायिक महत्व लगातार बढ़ रहा है।
शिटाके मशरूम
शिटाके दुनिया के सबसे प्रसिद्ध औषधीय मशरूमों में से एक है। इसका उपयोग कई देशों में स्वास्थ्यवर्धक भोजन और औषधीय उत्पादों में किया जाता है। झारखंड में इसकी खेती अभी सीमित स्तर पर शुरू हुई है, लेकिन भविष्य में इसकी संभावनाएं काफी बेहतर मानी जा रही हैं।
रीशी (गैनोडर्मा) मशरूम
रीशी या गैनोडर्मा सामान्य भोजन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसका उपयोग मुख्य रूप से आयुर्वेद, हर्बल दवाओं और हेल्थ सप्लीमेंट्स के निर्माण में किया जाता है। इसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण औषधीय मशरूमों में शामिल किया जाता है।
किसानों के लिए बन रहा है कमाई का नया जरिया
झारखंड सरकार, कृषि विभाग और विभिन्न संस्थाएं किसानों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार को बढ़ावा दे रही हैं। खासकर महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को मशरूम उत्पादन से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। कम लागत और बेहतर बाजार मिलने के कारण मशरूम उत्पादन ग्रामीण युवाओं के लिए भी रोजगार का मजबूत विकल्प बनकर उभरा है।
झारखंड की नई पहचान बन रहे मशरूम
रुगड़ा, पुटू और अन्य जंगली मशरूम जहां झारखंड की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का हिस्सा हैं, वहीं आधुनिक तकनीक से उगाए जाने वाले मशरूम किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक खेती और बेहतर विपणन पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो आने वाले वर्षों में झारखंड देश के प्रमुख मशरूम उत्पादक राज्यों में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है।
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