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बिहार राज्यसभा चुनाव: NDA बनाम विपक्ष की सियासी जंग, AIMIM बन सकती है किंगमेकर

AIMIM और BSP के विधायक समीकरण बदलने की स्थिति में दिखाई दे रहे हैं,

पटना: बिहार में लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। इस बार का चुनाव खास इसलिए भी है क्योंकि इसमें तीन राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय अध्यक्ष मैदान में हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की प्रतिष्ठा भी इस चुनाव से जुड़ी मानी जा रही है।

एनडीए की ओर से राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को भी उम्मीदवार बनाया गया है, जबकि विपक्ष की तरफ से राजद ने बिहार के सबसे अमीर सांसदों में शामिल अमरेंद्र धारी सिंह (एडी सिंह) को मैदान में उतारा है।

इस चुनाव में सबसे दिलचस्प बात यह है कि AIMIM और BSP के विधायक समीकरण बदलने की स्थिति में दिखाई दे रहे हैं, जिससे मुकाबला और रोमांचक हो गया है।


NDA का दावा—पांचों सीटें जीतेंगे

एनडीए नेताओं का कहना है कि गठबंधन को सभी सीटों पर जीत मिलेगी।

RLM अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि

“NDA राज्यसभा की सभी पांच सीटें जीत रही है, इसमें कोई संदेह नहीं है। विपक्ष के कई विधायक भी हमारे संपर्क में हैं।”

वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी दावा किया कि

“NDA सभी पांचों सीटों पर जीत दर्ज करेगा।”

हालांकि राजनीतिक गतिविधियां बता रही हैं कि मुकाबला उतना आसान नहीं है जितना दावा किया जा रहा है।


NDA को सेंधमारी का डर?

सूत्रों के मुताबिक NDA को विपक्ष से ज्यादा अपने ही गठबंधन के भीतर क्रॉस वोटिंग का डर सता रहा है। इसी वजह से गठबंधन ने चुनाव में एक नई रणनीति अपनाई है।

इस बार राज्यसभा उम्मीदवारों के प्रस्तावक के रूप में सभी विधायकों को शामिल किया गया है, ताकि मतदान के समय विधायक न अनुपस्थित रहें और न ही क्रॉस वोटिंग का जोखिम लें।

उपेंद्र कुशवाहा की जीत को लेकर भी शुरुआती आशंकाएं थीं, क्योंकि HAM प्रमुख जीतन राम मांझी और LJP (रामविलास) के नेता चिराग पासवान के बयानों से असमंजस की स्थिति बन रही थी।

इसी बीच भाजपा ने एक बड़ा कदम उठाते हुए दलित नेता शिवेश राम को उम्मीदवार बनाया, ताकि गठबंधन के सहयोगी दल एकजुट रहें।


2014 में भी हुई थी सेंधमारी

बिहार में इससे पहले 2014 के राज्यसभा चुनाव में भी बड़ा राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला था। उस समय जदयू के 18–20 विधायकों ने बगावत कर दी थी और पार्टी उम्मीदवारों की जगह निर्दलीय उम्मीदवारों को वोट दे दिया था।

हालांकि अंतिम समय में राजद के समर्थन से जदयू उम्मीदवार जीतने में सफल हो गए थे और बागियों की योजना फेल हो गई थी।


विपक्ष की रणनीति: NDA विधायकों पर नजर

उधर विपक्ष की तरफ से भी सियासी गणित साधने की कोशिश जारी है।

सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता, जो खुद भूमिहार समुदाय से आते हैं, एनडीए के भूमिहार विधायकों से संपर्क साध रहे हैं। दिल्ली और अन्य जगहों पर उनकी मुलाकातें भी हुई हैं।

राजद उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह के पास फिलहाल—

  • राजद के 25 विधायक

  • कांग्रेस के 6

  • वाम दलों के 3

  • IIP के 1

यानी कुल 35 विधायकों का समर्थन बताया जा रहा है। जीत के लिए उन्हें अभी 6 और विधायकों की जरूरत है।


AIMIM की शर्त: समर्थन के बदले परिषद सीट

राज्यसभा की पांचवीं सीट पर AIMIM के 5 और BSP के 1 विधायक निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान ने कहा कि अगर महागठबंधन को समर्थन चाहिए तो बदले में विधान परिषद की एक सीट AIMIM को देनी होगी।

उन्होंने कहा:

“अगर हम राज्यसभा चुनाव में मदद करेंगे तो विधान परिषद की खाली सीट पर हमें समर्थन मिलना चाहिए। राजनीति में गिव एंड टेक चलता है।”

सूत्रों के अनुसार AIMIM अपने नेता आदिल को विधान परिषद भेजने के लिए डील चाहती है।


वोटों का गणित क्या कहता है?

राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए जरूरी वोटों की संख्या ड्रॉप कोटा फॉर्मूले से तय होती है।

अगर सभी 243 विधायक मतदान करते हैं तो एक सीट जीतने के लिए 41 वोट जरूरी होंगे।

लेकिन अगर कुछ विधायक वोटिंग से दूर रहते हैं तो यह आंकड़ा घट सकता है।

उदाहरण के लिए—
अगर AIMIM के 5 विधायक मतदान नहीं करते हैं, तो कुल वैध वोट 238 रह जाएंगे। ऐसे में जीत के लिए लगभग 40 वोट ही काफी होंगे।

इस स्थिति में NDA को पांचवीं सीट जीतने के लिए सिर्फ 2 अतिरिक्त विधायकों का समर्थन चाहिए होगा।


चुनाव में कौन बनाएगा-बिगाड़ेगा खेल?

फिलहाल बिहार का राज्यसभा चुनाव पूरी तरह राजनीतिक गणित और रणनीति की जंग बन चुका है।

  • NDA अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश कर रहा है

  • विपक्ष सेंधमारी की रणनीति पर काम कर रहा है

  • AIMIM और BSP जैसी पार्टियां किंगमेकर की भूमिका में दिख रही हैं

अब देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक समीकरण किसके पक्ष में जाते हैं और क्या 2014 जैसी सियासी कहानी एक बार फिर दोहराई जाएगी।

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