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बड़कागढ़ रियासत का ऐतिहासिक विजयादशमी महोत्सव, आज भी जीवंत है मां चिंतामणि की परंपरा

ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा बड़कागढ़ का विजयादशमी उत्सव

बड़कागढ़ रियासत का ऐतिहासिक विजयादशमी महोत्सव, हटिया में आज भी जीवंत है मां चिंतामणि की परंपरा

Ranchi News: रांची के हटिया स्थित बड़कागढ़ रियासत में हर वर्ष की तरह इस बार भी ऐतिहासिक दुर्गा पूजा एवं विजयादशमी महोत्सव का आयोजन किया गया। इस दौरान राजपरिवार और ग्रामीणों ने मां भगवती चिंतामणि की पूजा-अर्चना की। इसके साथ ही अपराजिता बांधने, सहभोज और पान खिलाकर अतिथियों को विदा करने जैसी पारंपरिक रस्में निभाई गईं।

बड़कागढ़ रियासत के उत्तराधिकारी राजेशनाथ शाहदेव के आयोजन में संपन्न इस महोत्सव में परिवार के सदस्यों, गणमान्य लोगों और ग्रामीणों ने भाग लिया। यह आयोजन क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक-सामाजिक परंपराओं को जीवंत रखने का प्रतीक है।

1691 में हुई थी बड़कागढ़ रियासत की स्थापना

आयोजकों की ओर से साझा किए गए ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, बड़कागढ़ रियासत की स्थापना वर्ष 1691 में ठाकुर ऐनी नाथ शाहदेव ने की थी। वर्ष 1857 में ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव रियासत के राजा बने। इसी दौरान प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ और उन्होंने छोटानागपुर क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया।

बताया जाता है कि अंग्रेजों ने ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को गिरफ्तार कर 16 अप्रैल 1858 को रांची के जिला स्कूल परिसर में फांसी दे दी थी। इसके बाद उनकी पत्नी अपने एक वर्षीय पुत्र कपिलनाथ शाहदेव को लेकर अज्ञातवास में चली गईं। आयोजकों के विवरण के मुताबिक, करीब 12 वर्ष बाद उनके सामने आने पर अंग्रेजी सरकार ने जगन्नाथपुर के समीप उनके रहने के लिए मिट्टी का मकान बनवाया। बाद में राजपरिवार के वंशज वहीं रहने लगे।

मां भगवती चिंतामणि की पूजा से जुड़ी है पुरानी परंपरा

बड़कागढ़ रियासत में दुर्गा पूजा और विजयादशमी का आयोजन लंबे समय से होता आ रहा है। इस अवसर पर आसपास के गांवों के लोग एकत्र होकर मां भगवती चिंतामणि की आराधना करते हैं।

स्थानीय परंपरा के अनुसार, पूजा की तैयारियों में मुस्लिम परिवारों के लोग भी सहयोग करते थे। वे मां भगवती की डोली ले जाने वाले रास्ते की सफाई और सजावट में हिस्सा लेते थे। डोली को सजाने के लिए परिवार की बहू की पुरानी साड़ी का इस्तेमाल करने की परंपरा भी बताई जाती है। आयोजकों के अनुसार, यह परंपरा वर्ष 1880 से चली आ रही है।

विजयादशमी पर पूजा, सहभोज और पान खिलाकर विदाई

परंपरा के अनुसार, नवरात्र के नौ दिनों तक मां चिंतामणि की आराधना के बाद दशमी के दिन विजयादशमी मिलन समारोह आयोजित किया जाता है। पूजा के बाद प्रसाद तैयार किया जाता है और कार्यक्रम में पहुंचे ग्रामीणों तथा गणमान्य अतिथियों को आदरपूर्वक सहभोज कराया जाता है।

इसके बाद सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए पान खिलाकर विदा किया जाता है। इस आयोजन का उद्देश्य धार्मिक परंपरा के साथ सामाजिक मेलजोल और सामुदायिक एकता को बनाए रखना भी है।

राजपुरोहित ने राजपरिवार को बांधा अपराजिता

इस वर्ष भी राजपुरोहित सदन गोपाल शर्मा ने राजपरिवार के सदस्यों को अपराजिता बांधकर सुख-समृद्धि और विजय का आशीर्वाद दिया। परंपरा के अनुसार, परिवार की बहुओं और बेटियों को उनके घर जाकर भी अपराजिता बांधी गई। इस दौरान उनके सुखी, समृद्ध और सौभाग्यशाली जीवन की कामना की गई।

समारोह में शामिल हुए कई गणमान्य लोग

विजयादशमी महोत्सव में लाल सचिंद्र देव, मीरा देवी, राखी शाहदेव, रेखा देव, बिपिन कुमार, लाल धर्मेंद्र देव, लाल सुरेंद्र देव, सदन गोपाल शर्मा, शैलेंद्र शाहदेव, शान प्रताप, मयंक प्रताप, हरेन्द्र भंजदेव, लता भांजदेव, प्रदीप जायसवाल और भीखम उरांव सहित कई लोग शामिल हुए।

बड़कागढ़ रियासत का यह आयोजन धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक स्मृति और सामाजिक सद्भाव से जुड़ी परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर बना।

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