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झारखंड की मिट्टी, भाषा और कहानियों से बनेगी सिनेमा की नई पहचान, आदिवासी महोत्सव में फिल्म निर्माण पर मंथन
Ranchi: झारखंड आदिवासी महोत्सव 2026 के दूसरे दिन सोमवार को मोरहाबादी मैदान स्थित वीर बुधु भगत सभागार में फिल्मों की स्क्रीनिंग के साथ फिल्म निर्माण को लेकर विशेष पैनल डिस्कशन और मास्टरक्लास का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड में फिल्म निर्माण की संभावनाओं, तकनीकी प्रशिक्षण, स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर देने और राज्य की अपनी सिनेमाई पहचान विकसित करने पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम में युवा फिल्मकारों, विद्यार्थियों, कलाकारों और सिनेमा में रुचि रखने वाले दर्शकों ने हिस्सा लिया। फिल्म स्क्रीनिंग के बाद विशेषज्ञों के साथ संवाद ने कार्यक्रम को और खास बना दिया।
स्थानीय कहानियों को सिनेमा की पहचान बनाने पर जोर
पैनल डिस्कशन में सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट से जुड़े विशेषज्ञ इंद्रनील मुखर्जी, प्रदीप्तो भट्टाचार्य और फिल्म निर्देशक निरंजन कुजूर शामिल हुए। कार्यक्रम का संचालन ‘पंचायत’ की कलाकार कल्याणी खत्री ने किया।
चर्चा के दौरान फिल्म निर्माण की प्रक्रिया, निर्देशन, एडिटिंग, प्रोडक्शन, सिनेमैटोग्राफी और कहानी लेखन से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों पर बातचीत हुई। प्रतिभागियों ने यह जानने की कोशिश की कि झारखंड में फिल्म निर्माण की शुरुआत कैसे की जा सकती है और स्थानीय कहानियों को बड़े पर्दे तक कैसे पहुंचाया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि झारखंड की अपनी मिट्टी, संस्कृति, भाषाएं, लोककथाएं और सामाजिक जीवन यहां के सिनेमा को अलग पहचान दे सकते हैं।
फिल्म बनाने के लिए सिर्फ प्रशिक्षण ही जरूरी नहीं
फिल्म निर्माण में औपचारिक प्रशिक्षण की भूमिका पर चर्चा करते हुए पैनलिस्टों ने कहा कि अच्छी फिल्म बनाने के लिए हमेशा संस्थागत प्रशिक्षण जरूरी नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण चीज फिल्मकार की अपनी दृष्टि, संवेदना और कहानी को समझने की क्षमता है।
हालांकि, प्रशिक्षण से तकनीकी दक्षता को बेहतर किया जा सकता है। फिल्म निर्माण में कैमरा, एडिटिंग, साउंड, लाइटिंग और अन्य तकनीकी पहलुओं की जानकारी कहानी को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में मदद करती है।
प्राकृतिक रोशनी से लेकर आधुनिक तकनीक तक चर्चा
फिल्मों में लाइटिंग के इस्तेमाल पर भी विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि किसी फिल्म में प्राकृतिक रोशनी या कृत्रिम प्रकाश का इस्तेमाल कहानी और दृश्य की जरूरत के अनुसार किया जाता है।
प्राकृतिक रोशनी अपनी सहजता और खूबसूरती के कारण महत्वपूर्ण है, वहीं आधुनिक तकनीक फिल्मकारों को दृश्य को अपनी जरूरत के मुताबिक तैयार करने की अधिक स्वतंत्रता देती है।
सिनेमा में भावनाओं का संतुलन जरूरी
फिल्मों में इमोशनल दृश्यों को लेकर भी चर्चा हुई। पैनलिस्टों ने कहा कि किसी दृश्य में भावनाओं की मात्रा का संतुलन बेहद महत्वपूर्ण होता है।
सिर्फ अभिनेता का अभिनय ही किसी दृश्य को भावुक नहीं बनाता। निर्देशन, एडिटिंग, साउंड, म्यूजिक, कलर और दर्शक की मनोदशा भी फिल्म के भावनात्मक प्रभाव को निर्धारित करती है। भावनाओं की अधिकता कई बार फिल्म को बोझिल बना सकती है।
‘अपनी मिट्टी की महक वाली कहानियां जरूरी’
फिल्म निर्देशक निरंजन कुजूर ने कहा कि उनके लिए कहानी का सबसे महत्वपूर्ण आधार वह विषय है, जो उन्हें भीतर से प्रभावित करता है। झारखंड की संस्कृति, समाज और अपनी जमीन से जुड़े अनुभव उन्हें कहानी लिखने के लिए प्रेरित करते हैं।
उन्होंने कहा कि अपनी संस्कृति और मिट्टी की महक वाली कहानियों को सिनेमा में स्थान देना जरूरी है। कुरुख जैसी क्षेत्रीय भाषाओं और आदिवासी जीवन से जुड़े विषय झारखंड के सिनेमा को अलग पहचान दे सकते हैं।
अभिनेता और निर्देशक के बीच बेहतर तालमेल जरूरी
अभिनय को लेकर चर्चा में कहा गया कि अभिनेता और निर्देशक के बीच रचनात्मक तालमेल फिल्म की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह प्रक्रिया कास्टिंग के समय से ही शुरू हो जाती है।
अभिनेता की ऊर्जा, व्यक्तित्व और अभिव्यक्ति को समझकर निर्देशक उससे भूमिका के अनुरूप बेहतर प्रदर्शन कराने की कोशिश करता है। लगातार संवाद और साथ काम करने से दोनों के बीच रचनात्मक समझ विकसित होती है।
OTT और फीचर फिल्मों की एडिटिंग में अंतर
पैनल डिस्कशन में OTT और फीचर फिल्मों की एडिटिंग के अंतर पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों के अनुसार OTT में दर्शकों का ध्यान लगातार बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है। इसलिए कट, साउंड और म्यूजिक सहित कई तकनीकी पहलुओं का इस्तेमाल अलग तरीके से किया जाता है।
वहीं फीचर फिल्म में दर्शक लंबे समय तक एक निरंतर सिनेमाई अनुभव का हिस्सा रहता है। ऐसे में कहानी, अभिनय, एडिटिंग, साउंड और म्यूजिक को एक समग्र अनुभव के रूप में तैयार किया जाता है।
क्षेत्रीय भाषाएं बन सकती हैं झारखंडी सिनेमा की ताकत
कार्यक्रम में झारखंड की क्षेत्रीय भाषाओं को सिनेमा की ताकत बनाने पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि आदिवासी जीवन, लोककथाएं, प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और समकालीन सामाजिक मुद्दे झारखंड के सिनेमा को देश के अन्य हिस्सों से अलग पहचान दे सकते हैं।
स्थानीय भाषाओं में फिल्म निर्माण से लेखकों, कलाकारों, निर्देशकों, निर्माताओं, संपादकों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए रोजगार और रचनात्मक अवसर भी बढ़ेंगे।
विशेषज्ञों ने कहा कि झारखंड को मजबूत फिल्म हब बनाने के लिए स्थानीय प्रतिभाओं को प्रशिक्षण, तकनीकी संसाधन, वित्तीय सहयोग और फिल्मों को प्रदर्शित करने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराने होंगे।
कई फिल्मों की हुई स्क्रीनिंग
कार्यक्रम के दौरान एनिमेशन फिल्म ‘XENO’ और ‘PRIYO AMI’ सहित कई लघु एवं एनिमेशन फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। ‘PRIYO AMI’ का निर्देशन सुचना साहा ने किया है।
इसके अलावा ‘What Are You Searching’, ‘Look at the Sky’ और ‘Tou-Tai’ जैसी फिल्मों की भी स्क्रीनिंग हुई। झारखंड की क्षेत्रीय भाषाओं में बनी ‘Sohrai’ (हिंदी), ‘Miyad Arah Gaada’ (मुंडारी), ‘Gadi Lohardaga Mail’ (हिंदी) और ‘Aabua Paika Kabu Baegya’ (मुंडारी) जैसी फिल्मों को भी दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया।
इन फिल्मों के माध्यम से झारखंड की स्थानीय संस्कृति, भाषाई विविधता, सामाजिक जीवन, परंपराओं और समकालीन मुद्दों को सिनेमा के माध्यम से सामने रखने का प्रयास किया गया।
झारखंड को मिल सकती है अपनी सिनेमाई पहचान
पूरे कार्यक्रम का मुख्य संदेश यही रहा कि झारखंड को अपनी सिनेमाई पहचान बनाने के लिए बाहर की कहानियों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। राज्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी अपनी मिट्टी, भाषाएं, संस्कृति और कहानियां हैं।
जरूरत इन कहानियों को आधुनिक तकनीक और सिनेमा की भाषा देने की है। स्थानीय प्रतिभाओं को प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर झारखंड देश के प्रमुख फिल्म निर्माण केंद्रों में अपनी अलग पहचान बना सकता है।
कार्यक्रम में सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट के प्रभारी कुलपति शुक्रांतो मजूमदार, शिलादित्य सान्याल, नीलांजन बनर्जी, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की संयुक्त सचिव मोनिका टूटी, संयुक्त निदेशक आनंद, उप निदेशक सैयद राशिद अख्तर, फिल्म निर्देशक बीजू टोप्पो सहित अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का मंच संचालन भारती ओझा ने किया।अगर चाहें तो इसके लिए SEO Title, Meta Description, URL Slug और Focus Keywords भी बना सकता हूं।

